नल में पानी नहीं, सरकारी रिपोर्ट में ‘उत्तम’! जांच में मिला उल्टी-दस्त का वायरस, आदिवासी गांवों में नल-जल योजना पर खर्च हुए 4 करोड़
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में नल-जल योजना की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी रिपोर्ट में जहां पानी को उत्तम बताया गया, वहीं वास्तविक जांच में पानी में उल्टी-दस्त फैलाने वाले वायरस मिलने की बात सामने आई है। आदिवासी गांवों में घर-घर नल से पानी पहुंचाने के लिए करीब 4 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीणों को साफ और सुरक्षित पानी नहीं मिल पा रहा है।
मामला सामने आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था और पानी की गुणवत्ता जांचने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि योजना पर बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी उन्हें दूषित पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है।
रिपोर्ट और जांच में सामने आया अंतर
सरकारी रिकॉर्ड में जिन गांवों में नल-जल योजना के तहत पानी की आपूर्ति दिखाई गई, वहां पानी की गुणवत्ता को बेहतर बताया गया था। लेकिन जब पानी के नमूनों की जांच कराई गई तो स्थिति अलग सामने आई।
जांच में पानी में ऐसे तत्व और वायरस पाए जाने की बात सामने आई, जो उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं। इससे साफ है कि पानी की गुणवत्ता को लेकर की गई निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी रही है।
4 करोड़ खर्च, फिर भी ग्रामीण परेशान
आदिवासी गांवों में पेयजल समस्या दूर करने के लिए नल-जल योजना के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए गए। योजना का उद्देश्य था कि ग्रामीणों को घर-घर स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि कई जगह नल तो लगाए गए, लेकिन नियमित और शुद्ध पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है। कुछ स्थानों पर पानी की गुणवत्ता खराब होने से लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
स्वास्थ्य पर बढ़ा खतरा
दूषित पानी पीने से ग्रामीणों में पेट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। उल्टी-दस्त जैसी समस्याएं खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए ज्यादा परेशानी का कारण बन सकती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पेयजल की नियमित जांच और जल स्रोतों की सफाई जरूरी है। यदि पानी में संक्रमण फैलाने वाले तत्व पाए जाते हैं तो समय पर कार्रवाई नहीं होने से बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।
जिम्मेदारों पर उठे सवाल
मामला सामने आने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि जब सरकारी रिपोर्ट में पानी को उत्तम बताया गया था तो जांच में गड़बड़ी कैसे सामने आई। ग्रामीणों ने मांग की है कि पानी की गुणवत्ता की दोबारा जांच कराई जाए और लापरवाही करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीणों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके लिए जल स्रोतों की सफाई, पाइपलाइन व्यवस्था की जांच और नियमित पानी की गुणवत्ता परीक्षण जरूरी होगा।
योजना की निगरानी पर सवाल
नल-जल योजना पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि ग्रामीणों को दूषित पानी मिल रहा है तो यह योजना के क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर जल्द सुधारात्मक कदम उठाएगा, ताकि उन्हें सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल मिल सके। फिलहाल पानी की जांच रिपोर्ट ने सरकारी दावों और जमीनी स्थिति के बीच बड़ा अंतर उजागर कर दिया है।