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जंतर-मंतर आंदोलन में शामिल होना पड़ा भारी! बरेली के असिस्टेंट प्रोफेसर मोहित भारद्वाज बर्खास्त, नारेबाजी बनी कार्रवाई की वजह

 

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक बड़ा मामला सामने आया है। यहां एक डिग्री कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर मोहित भारद्वाज को कॉलेज प्रशासन ने सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई उनके 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित छात्र आंदोलन में शामिल होने और वहां सरकार विरोधी नारे लगाने के आरोपों के बाद की गई। इस फैसले के बाद शिक्षा जगत और सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है।

जानकारी के मुताबिक, 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्र विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और अन्य लोग शामिल हुए थे। इसी दौरान मोहित भारद्वाज भी प्रदर्शन में पहुंचे और कथित तौर पर सरकार के खिलाफ नारे लगाए। वायरल वीडियो में उन्हें "मोदी तुम होश में आओ" और "मोदी जब-जब डरता है, पुलिस को आगे करता है" जैसे नारे लगाते हुए देखा गया।

बताया जा रहा है कि 22 जुलाई को आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं और उससे जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने मामले का संज्ञान लिया और प्रोफेसर की गतिविधियों की समीक्षा शुरू की। जांच के बाद संस्थान ने उन्हें सेवा नियमों के उल्लंघन और संस्थान की छवि प्रभावित होने का हवाला देते हुए बर्खास्त करने का निर्णय लिया।

कॉलेज प्रशासन का कहना है कि शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आचरण से संस्थान की गरिमा बनाए रखें। यदि कोई कर्मचारी ऐसी गतिविधियों में शामिल होता है, जिनसे संस्थान की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

वहीं, इस कार्रवाई को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सरकारी या निजी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों को सेवा नियमों का पालन करना चाहिए। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होना नागरिक का अधिकार है और ऐसे मामलों में सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

फिलहाल, इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है। कई लोग कॉलेज प्रशासन के फैसले का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे कठोर कार्रवाई बता रहे हैं। यदि प्रोफेसर इस निर्णय को चुनौती देते हैं, तो मामला कानूनी प्रक्रिया तक भी पहुंच सकता है।

यह प्रकरण एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि शिक्षकों की सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों की सीमा क्या होनी चाहिए तथा सेवा नियमों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिलहाल, बरेली के इस मामले ने शिक्षा जगत के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज कर दी है।