गोरखपुर में पॉक्सो के 75 मामलों का हुआ निपटारा, 31 में सजा तो 44 मामलों में आरोपी बरी
नाबालिग बच्चों और बच्चियों से जुड़े अपराधों में बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद मामलों में सजा की दर अब भी एक चुनौती बनी हुई है। गोरखपुर जिले में पिछले सात महीने के दौरान पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज 75 मामलों में अदालत ने फैसला सुनाया। इनमें 31 मामलों में आरोपितों को दोषी ठहराते हुए सजा दी गई, जबकि 44 मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो गए।
पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences) एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। इसके तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन किया गया है, ताकि पीड़ित बच्चों को जल्द न्याय मिल सके। हालांकि, गोरखपुर के आंकड़े बताते हैं कि दर्ज मामलों की तुलना में दोषसिद्धि की दर अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
आंकड़ों के अनुसार, सात महीने में पॉक्सो के कुल 75 मामलों में न्यायालय का फैसला आया। इनमें करीब 41 प्रतिशत मामलों में आरोप साबित हुए और आरोपियों को सजा मिली, जबकि बाकी मामलों में अदालत ने सबूतों के अभाव या अन्य कानूनी आधारों पर आरोपियों को बरी कर दिया।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, पॉक्सो मामलों में दोषसिद्धि के लिए मजबूत साक्ष्य, पीड़ित और गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और जांच प्रक्रिया की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती है। कई मामलों में जांच में कमी, सबूतों की कमजोर प्रस्तुति या गवाहों के बयान बदलने जैसी वजहों से आरोपी अदालत से राहत पा जाते हैं।
पुलिस और अभियोजन विभाग की ओर से लगातार कोशिश की जाती है कि ऐसे मामलों में प्रभावी पैरवी कर पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सके। इसके लिए मामलों की निगरानी और समय पर चार्जशीट दाखिल करने पर भी जोर दिया जाता है।
बच्चों से जुड़े अपराधों में त्वरित न्याय की मांग लंबे समय से उठती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जांच से लेकर अदालत में सुनवाई तक हर स्तर पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है, ताकि दोषियों को सजा मिल सके और पीड़ितों को न्याय का भरोसा कायम रहे।
गोरखपुर में सामने आए ये आंकड़े पॉक्सो मामलों में दर्ज मुकदमों और सजा के बीच के अंतर को दिखाते हैं। आने वाले समय में पुलिस जांच, अभियोजन की मजबूती और न्यायिक प्रक्रिया की गति पर इन मामलों के नतीजे काफी हद तक निर्भर करेंगे।