अमेरिकी टैरिफ के बाद जूता कारोबार को यूरोपीय एफटीए से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद
अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के कारण पिछले कुछ महीनों में मुश्किलों का सामना कर रहे जूता कारोबारियों को अब यूरोपीय देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) से राहत मिलने की उम्मीद है। उद्योग विशेषज्ञ और वित्तीय विश्लेषक इसे जूता निर्यात कारोबार के लिए एक “बूस्टर डोज” के रूप में देख रहे हैं।
अमेरिका द्वारा उच्च टैरिफ लागू किए जाने के बाद भारतीय जूता निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। अमेरिकी बाजार में मांग के बावजूद बढ़े हुए आयात शुल्क ने छोटे और बड़े दोनों प्रकार के व्यवसायों की आय को प्रभावित किया। कई कारोबारियों ने बताया कि उनकी उत्पाद लागत में इजाफा होने और प्रतिस्पर्धा में कमी आने से उनके लाभांश पर नकारात्मक असर पड़ा।
इसी बीच यूरोपीय संघ के साथ हुए एफटीए से कारोबारियों को उम्मीद है कि उन्हें अमेरिकी बाजार में हुए नुकसान की भरपाई का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते के तहत भारतीय जूतों और चमड़े के उत्पादों पर यूरोपीय देशों में सीमा शुल्क कम या नगण्य होगा, जिससे भारत से निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी।
जूता उद्योग के शीर्ष व्यापारियों ने कहा कि यह एफटीए न सिर्फ निर्यातकों को वित्तीय राहत देगा, बल्कि नए बाजार खोलने और निर्यात बढ़ाने के अवसर भी पैदा करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि यूरोपीय बाजार में भारतीय जूतों की गुणवत्ता और डिजाइन को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, जिससे लंबे समय तक स्थिर निर्यात सुनिश्चित हो सकेगा।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ के कारण जूता निर्यात पर हुए झटकों से उबरने के लिए यूरोपीय एफटीए एक सही समय पर बड़ा कदम साबित होगा। उन्होंने कहा कि इससे भारतीय कारोबारियों को कैश फ्लो सुधारने, उत्पादन बढ़ाने और नई नौकरियों के अवसर बनाने में मदद मिल सकती है।
इंडियन फुटवियर एसोसिएशन के प्रतिनिधि ने भी इस समझौते का स्वागत किया और बताया कि यह एफटीए न केवल आर्थिक राहत देगा, बल्कि जूता उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति में लाने में भी सहायक होगा। उन्होंने कहा कि पहले अमेरिकी टैरिफ की मार ने छोटे और मझोले व्यवसायों को सबसे अधिक प्रभावित किया, लेकिन यूरोपीय बाजार में आसान पहुँच से उनके लिए नई संभावनाएं खुलेंगी।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यह एफटीए भारत के जूता निर्यात को दीर्घकालिक लाभ देगा। अमेरिका पर निर्भरता कम होने से भारतीय कंपनियों को विविध बाजारों में निवेश करने और अपनी उत्पाद श्रृंखला को व्यापक बनाने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही, यूरोपीय देशों में भारतीय जूतों की ब्रांडिंग और विपणन के लिए भी बेहतर अवसर मिलेंगे।
इस तरह, अमेरिकी टैरिफ के बाद जूता उद्योग को यूरोपीय एफटीए के माध्यम से एक नई राह दिखाई दे रही है। निर्यातक आशा कर रहे हैं कि यह समझौता उनके कारोबार को आर्थिक रूप से सशक्त करेगा और भारत के फुटवियर उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाए रखेगा।