खांसी-बलगम नहीं, फिर भी निकली टीबी: एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामले दोगुने, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट
टीबी को आमतौर पर खांसी, बलगम और फेफड़ों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब इसके लक्षण और स्वरूप तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। हाल के मामलों में सामने आया है कि बिना खांसी और बलगम के सिर्फ बुखार और लगातार वजन कम होने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करना लोगों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। ऐसे ही एक मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद चौंकाने वाला खुलासा हुआ, जिसमें मरीज के दिमाग, आंत, बच्चेदानी, हड्डी और बगल में टीबी के कीटाणु पनपते पाए गए।
जानकारी के अनुसार, संबंधित मरीज को लंबे समय से बुखार आ रहा था और उसका वजन तेजी से घट रहा था। चूंकि खांसी या बलगम की समस्या नहीं थी, इसलिए उसने इसे सामान्य वायरल या मौसमी बुखार समझकर अनदेखा कर दिया। कई बार उसने खुद ही बुखार की दवाएं खा लीं, लेकिन बीमारी की जड़ तक नहीं पहुंचा। हालत बिगड़ने पर जब स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच की तो पता चला कि मरीज एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी से पीड़ित है।
स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी वह स्थिति है, जिसमें टीबी के कीटाणु फेफड़ों के बजाय शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करते हैं। इसमें दिमाग, आंत, हड्डियां, लसीका ग्रंथियां (बगल), बच्चेदानी और अन्य अंग शामिल हो सकते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे मामलों की पहचान देर से होती है, क्योंकि इसके लक्षण सामान्य टीबी से अलग और अस्पष्ट होते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बीते वर्षों की तुलना में इस वर्ष एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मरीजों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जीवनशैली, कमजोर इम्यूनिटी, कुपोषण और समय पर जांच न कराना इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। कई मरीज शुरुआती लक्षणों को मामूली समझकर डॉक्टर के पास जाने से बचते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।
स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि यदि किसी को लंबे समय तक बुखार, बिना कारण वजन कम होना, शरीर के किसी हिस्से में सूजन, लगातार दर्द या कमजोरी महसूस हो रही हो, तो तुरंत जांच कराएं। टीबी अब पूरी तरह इलाज योग्य बीमारी है, बशर्ते इसकी समय पर पहचान और इलाज शुरू किया जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी केवल खांसी तक सीमित नहीं है। इसके बदलते स्वरूप को समझना और जागरूक रहना बेहद जरूरी है। लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है, जबकि समय पर जांच और उपचार से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।