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सीएम योगी का अविमुक्तेश्वरानंद विवाद में बड़ा हमला, वीडियो में देखें बोले– परंपरा तोड़ने का किसी को अधिकार नहीं, कालनेमियों से रहना होगा सतर्क

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना किसी का नाम लिए धार्मिक परंपराओं को लेकर कड़ा बयान दिया है। सीएम योगी ने कहा कि किसी को भी सनातन धर्म की परंपराओं को बाधित करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज समाज में ऐसे तमाम “कालनेमि” मौजूद हैं, जो धर्म की आड़ लेकर सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। ऐसे लोगों से देश और समाज को सतर्क रहने की जरूरत है।

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सीएम योगी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब हाल के दिनों में कुछ धार्मिक मुद्दों को लेकर विवाद सामने आए हैं। अपने संबोधन में उन्होंने संन्यासी धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि एक सच्चे संन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ भी नहीं होता। अगर कोई व्यक्ति संन्यास की आड़ में समाज को तोड़ने, परंपराओं को कमजोर करने या भ्रम फैलाने का काम करता है, तो उससे सावधान रहने की आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में ‘कालनेमि’ शब्द का विशेष रूप से इस्तेमाल किया। हालांकि उन्होंने किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस संकेत को हालिया धार्मिक बहसों से जोड़कर देखा जा रहा है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इतिहास और धर्मग्रंथ हमें ऐसे लोगों से सतर्क रहने की सीख देते हैं, जो साधु-संत का वेश धारण कर समाज को गलत दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं।

रामायण में कालनेमि का उल्लेख करते हुए सीएम योगी के बयान को सांस्कृतिक संदर्भ से भी जोड़ा जा रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, कालनेमि रावण का मामा और मारीच का पुत्र था। जब लक्ष्मण युद्ध में मूर्छित हो गए थे और हनुमान संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, तब रावण ने कालनेमि को हनुमान को रोकने के लिए भेजा था। कालनेमि ने साधु का वेश धारण कर हनुमान को भ्रमित करने की कोशिश की, लेकिन अंत में उसकी सच्चाई सामने आ गई और हनुमान ने उसका वध कर दिया।

सीएम योगी ने इसी उदाहरण का हवाला देते हुए संकेत दिया कि आज भी समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो साधु-संत का चोला पहनकर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म एक मजबूत, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे कमजोर करने की कोशिशें बार-बार होती रही हैं, लेकिन समाज को सजग रहकर ऐसी साजिशों को विफल करना होगा।

योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराएं किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की साझा धरोहर होती हैं। उन्हें तोड़ने या मनमाने ढंग से बदलने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। उनका यह बयान अब राजनीतिक और धार्मिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है और इसे एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।