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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: जाति जन्म से तय, धर्म परिवर्तन या विवाह से नहीं बदलती

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से तय होती है और यह धर्म परिवर्तन या विवाह से बदलती नहीं है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने यह टिप्पणी करते हुए दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

यह मामला अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम) के समक्ष चल रहा था। विशेष न्यायाधीश ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत समन जारी किया था। आरोपियों ने इस कार्रवाई को कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जन्म से तय जाति व्यक्तिगत पहचान का आधार है। चाहे व्यक्ति अपना धर्म बदल ले या किसी विवाह से संबंधित हो जाए, उसकी जन्मजात जाति की पहचान अपरिवर्तनीय रहती है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने आरोपियों की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला सामाजिक और कानूनी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इसके तहत यह स्पष्ट हो गया कि जाति निर्धारण धर्म या विवाह जैसी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में यह निर्णय कानून और समाज में स्पष्ट दिशा देगा।

अधिवक्ताओं का कहना है कि अदालत का यह निर्णय अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रभाव को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जातिगत पहचान से जुड़े अधिकार और सुरक्षा कानून के तहत संरक्षित रहें।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की दृष्टि से जाति का निर्धारण जन्म से ही किया जाता है और यह पहचान व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक और कानूनी स्थिति को प्रभावित करती है। न्यायिक टिप्पणी से यह भी संकेत मिलता है कि जाति आधारित संरक्षण और आरक्षण के लिए जन्मजात जाति ही मान्य होगी, न कि धर्म परिवर्तन या विवाह।

इस फैसले से न केवल इस विशेष आपराधिक मामले में स्पष्ट न्यायिक निर्देश सामने आए हैं, बल्कि समाज में जाति, धर्म और विवाह संबंधी कानूनी विवादों में भी मार्गदर्शन मिलेगा। इसके तहत यह स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण कानून के अनुसार जन्म से ही मान्य होगा।

कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय कानूनी और सामाजिक दृष्टि से मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। न्यायालय ने जाति और धर्म संबंधी विवादों पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए यह संदेश दिया कि कानून जन्मजात पहचान को सर्वोच्च महत्व देता है।