इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर अपशब्द पोस्ट करने वालों को दी कड़ी चेतावनी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अदालत के खिलाफ अपशब्द या आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले यूजर्स को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। न्यायालय ने कहा है कि ऐसी टिप्पणियां, जो फेयर कमेंट या किसी फैसले की सोच-समझकर की गई आलोचना से आगे बढ़ती हैं, उन्हें बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बेंच के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि अगर कोर्ट अपने अवमानना क्षेत्राधिकार (Contempt of Court) में ऐसे पोस्टों पर संज्ञान लेता है, तो इसके कड़े कानूनी नतीजे होंगे।
न्यायालय ने कहा कि सोशल मीडिया पर किसी भी अदालत या न्यायाधीश के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट करना सिर्फ असभ्यता नहीं, बल्कि कानून की अवमानना के अंतर्गत आता है। न्यायाधीशों ने कहा कि यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर की गई टिप्पणियां भी कानूनी दायरे में आती हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि जनता को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। अगर किसी की टिप्पणी सिर्फ आलोचना के दायरे से बाहर जाकर अपमानजनक या अपशब्दपूर्ण हो जाती है, तो न्यायालय को इस पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला सोशल मीडिया और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि डिजिटल दुनिया में आलोचना और फीडबैक के अधिकार के साथ-साथ जिम्मेदारी और सतर्कता भी जरूरी है।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी जिम्मेदारी से कार्य करना होगा और यदि अदालत को ऐसे पोस्टों की जानकारी मिले, तो प्लेटफॉर्म्स को सहयोग देना अनिवार्य होगा।
न्यायालय ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति इस दिशा में अनदेखी करता है या लगातार आपत्तिजनक पोस्ट करता है, तो अदालत सख्त जुर्माना, गिरफ्तारी या अवमानना के अन्य कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है।
सोशल मीडिया विशेषज्ञों ने बताया कि यह फैसला डिजिटल युग में न्यायपालिका की गरिमा और विश्वास बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि यह आम जनता और सोशल मीडिया यूजर्स को सुरक्षित और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार की ओर प्रेरित करेगा।
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोर्ट का अपमान करने वाली किसी भी ऑनलाइन टिप्पणी को गंभीरता से लिया जाएगा। न्यायालय ने यह संदेश भी दिया कि अंतराल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अवमानना नहीं बर्दाश्त की जाएगी।
इस फैसले से सोशल मीडिया पर अदालतों के प्रति सम्मान और जिम्मेदार पोस्टिंग को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, यह निर्णय यह भी याद दिलाता है कि डिजिटल दुनिया में स्वतंत्रता के साथ-साथ नियमों का पालन करना भी अनिवार्य है।