इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अहम फैसला: शादी का वादा पूरा न होना हर मामले में आपराधिक अपराध नहीं
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि दो पढ़े-लिखे बालिग व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल इस आधार पर आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता कि बाद में शादी का वादा पूरा नहीं हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में हर परिस्थिति को तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि संबंध आपसी सहमति से स्थापित हुआ हो और दोनों पक्ष बालिग तथा शिक्षित हों, तो केवल विवाह न होने के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य किसी को प्रताड़ित करना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है।
इस मामले में याची के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस, दाखिल चार्जशीट और जारी समन आदेश को न्यायालय ने रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखते हुए प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आरोपी ने धोखाधड़ी या छलपूर्वक सहमति प्राप्त की हो।
न्यायालय ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का भी संदर्भ देते हुए कहा कि यदि शुरुआत से ही विवाह का इरादा न हो और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया गया हो, तो मामला अलग हो सकता है। लेकिन जहां संबंध लंबे समय तक आपसी सहमति और समझ के साथ कायम रहे हों, वहां हर असफल रिश्ते को आपराधिक रंग देना उचित नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में देखा जाएगा, जहां प्रेम संबंध टूटने के बाद आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं। अदालत ने यह भी दोहराया कि न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रतिशोध या दबाव बनाने के लिए न किया जाए।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट संकेत मिला है कि सहमति, परिस्थितियां और पक्षों की मंशा ऐसे मामलों में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। अदालत का यह निर्णय न्यायिक विवेक और विधिक संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।