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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: बहू सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि CrPC की धारा 125, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के रूप में लागू है, के तहत एक बहू अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।

यह निर्णय पारिवारिक भरण-पोषण से जुड़े मामलों में कानूनी दायित्वों की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बहू पर सीधे तौर पर सास-ससुर के भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, क्योंकि यह प्रावधान मुख्य रूप से पति-पत्नी और आश्रित संबंधों तक सीमित है।

कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि मृतक बेटे की संपत्ति से जुड़े उत्तराधिकार (inheritance) के मुद्दों को भरण-पोषण कार्यवाही के दायरे में शामिल नहीं किया जा सकता। यानी यदि किसी परिवार में संपत्ति विवाद या उत्तराधिकार से संबंधित प्रश्न हैं, तो उनका समाधान अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाएगा, न कि भरण-पोषण याचिका के माध्यम से।

यह मामला तब सामने आया जब एक याचिका में बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई थी। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट व्याख्या दी कि कानून के तहत इस तरह की जिम्मेदारी बहू पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं होती।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला पारिवारिक कानूनों की व्याख्या को और स्पष्ट करता है और भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायिक दिशा तय करने में मदद करेगा। उनका मानना है कि यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण साबित होगा, जहां परिवारों में संपत्ति और भरण-पोषण को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।

अदालत के इस फैसले के बाद सामाजिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे पारिवारिक जिम्मेदारियों की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला निर्णय बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह फैसला पारिवारिक संरचना और जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।

फिलहाल यह निर्णय निचली अदालतों के लिए भी एक मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में समान मामलों के निपटारे में सहायक साबित हो सकता है।