इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 साल पुराने हत्या मामले में 100 साल के बुजुर्ग को बरी किया, कहा—“अंतिम पड़ाव में सजा देना न्याय नहीं”
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक 42 साल पुराने हत्या मामले में अपने निर्णय से न्याय की संवेदनशीलता को उजागर किया है। अदालत ने 100 साल की उम्र पूरी कर चुके बुजुर्ग आरोपी को बरी करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हो, तो दशकों की देरी के बाद उसे सजा देना न्याय को एक निरर्थक अनुष्ठान में बदलने जैसा है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों के हवाले से जारी फैसले में कहा गया कि न्याय का उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं बल्कि समाज में न्याय और संतुलन बनाए रखना है। अदालत ने यह भी नोट किया कि लंबे समय तक चल रहे मामले न केवल वयोवृद्ध आरोपी के लिए बल्कि न्याय प्रक्रिया के लिए भी तनाव और अनावश्यक बोझ बन जाते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, बुजुर्ग पर 42 साल पहले हुई हत्या की घटना में आरोप लगाया गया था। इसके बावजूद विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं और अपीलों के चलते मामला वर्षों तक लंबित रहा। बुजुर्ग आरोपी की वर्तमान उम्र 100 वर्ष है और स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अब सजा देने का कोई व्यावहारिक या नैतिक औचित्य नहीं बचा है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि न्याय केवल कानूनी औपचारिकता या सजा देने का माध्यम नहीं है। यह मानव जीवन, नैतिकता और समाज के हित का संरक्षण भी है। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि लंबित मामलों में अगर आरोपी अत्यधिक वृद्ध और अस्वस्थ है, तो सजा का उद्देश्य पूरा नहीं होता, बल्कि वह सिर्फ अनावश्यक कष्ट और औपचारिकता बन जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वयोवृद्ध अपराधियों और लंबित मामलों के संदर्भ में न्यायिक प्रक्रिया को मानवतावादी दृष्टिकोण से देखने की दिशा में महत्वपूर्ण मिसाल है। इससे स्पष्ट होता है कि आखिरी उम्र में न्याय का अर्थ केवल सजा तक सीमित नहीं होना चाहिए।
वकीलों और न्यायविदों ने भी इस निर्णय की सराहना की है। उनका कहना है कि यह निर्णय कानूनी प्रणाली में संवेदनशीलता और विवेक के महत्व को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह फैसले न्यायिक निर्णयों में मानवीय पहलू को प्राथमिकता देने का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इस फैसले के बाद बुजुर्ग आरोपी को मुक्त कर दिया गया और उसे परिवार के पास सुरक्षित तरीके से भेजा गया। अदालत ने सरकार और पुलिस को यह निर्देश भी दिया कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाया जाए।
इस प्रकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय लंबित मामलों में न्याय और मानवाधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। यह फैसला बताता है कि कानून केवल सजा देने के लिए नहीं, बल्कि जीवन और न्याय के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता है।