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बंगाल में ममता की हार के बाद अखिलेश यादव ने उठाया बड़ा कदम, I-PAC के साथ डील रद्द की
 

 

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े बदलाव के बाद अब इसका असर राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक रणनीतियों पर भी दिखाई देने लगा है। बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी को मिली हार के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने बड़ा फैसला लेते हुए चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनी I-PAC के साथ अपनी डील रद्द कर दी है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी आगामी चुनावों को लेकर लंबे समय से नई रणनीति तैयार कर रही थी। इसके लिए पार्टी ने I-PAC की सेवाएं लेने पर सहमति जताई थी। बताया जा रहा है कि संगठन विस्तार, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, बूथ स्तर की तैयारी और चुनावी कैंपेन को लेकर कई दौर की बातचीत भी हुई थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद पार्टी नेतृत्व ने अचानक अपना रुख बदल लिया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में ममता बनर्जी की हार ने विपक्षी दलों को चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। इसी के चलते अखिलेश यादव ने यह बड़ा कदम उठाया। माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी अब अपने पारंपरिक संगठन और स्थानीय नेताओं पर ज्यादा भरोसा करने की तैयारी में है।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर भी I-PAC को लेकर अलग-अलग राय थी। कुछ नेताओं का मानना था कि बाहरी एजेंसियों पर अधिक निर्भरता से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर होता है। वहीं कुछ नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति बंगाल से अलग है और यहां जातीय समीकरणों तथा स्थानीय मुद्दों की समझ ज्यादा जरूरी है।

हालांकि समाजवादी पार्टी की ओर से अभी तक इस फैसले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन पार्टी के करीबी सूत्रों ने डील रद्द होने की पुष्टि की है। बताया जा रहा है कि पार्टी अब अपने स्तर पर नया चुनावी रोडमैप तैयार करेगी और जमीनी कार्यकर्ताओं को ज्यादा सक्रिय भूमिका दी जाएगी।

दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले को विपक्षी राजनीति में बदलती रणनीति के संकेत के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि हाल के चुनावी नतीजों के बाद कई दल अब प्रोफेशनल चुनावी कंपनियों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने लगे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव का यह कदम आने वाले समय में अन्य विपक्षी दलों को भी प्रभावित कर सकता है।

वहीं सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है। कुछ लोग अखिलेश यादव के फैसले को साहसिक बता रहे हैं, तो कुछ इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय मान रहे हैं। राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या समाजवादी पार्टी बिना किसी प्रोफेशनल चुनावी एजेंसी के आगामी चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी।

फिलहाल इस फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में समाजवादी पार्टी की नई चुनावी रणनीति और संगठनात्मक बदलावों पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।