पांच दशक बाद विधान परिषद में शिक्षक संगठनों का दबदबा खत्म, माध्यमिक शिक्षक संघ का खाता भी नहीं खुला
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव में इस बार शिक्षक संगठनों को बड़ा झटका लगा है। करीब पांच दशक तक सदन में प्रभाव बनाए रखने वाले माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रमुख गुटों को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों पर हुए चुनाव में शिक्षक संगठनों के प्रत्याशी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। इसके साथ ही विधान परिषद में माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का पुराना दबदबा समाप्त हो गया है।
शर्मा गुट का लगभग 48 साल पुराना प्रभाव खत्म
माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव रहा। संगठन के प्रमुख नेता ओमप्रकाश शर्मा करीब 48 वर्षों तक विधान परिषद सदस्य रहे। उनके नेतृत्व में शिक्षक संघ ने शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
हालांकि, इस बार चुनाव में संगठन को किसी भी सीट पर सफलता नहीं मिली। चुनाव से पहले संगठन के कुछ प्रमुख नेताओं का दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़ना भी चर्चा में रहा। ध्रुव कुमार त्रिपाठी भाजपा के टिकट पर गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से मैदान में उतरे और जीत हासिल की। वहीं, संगठन के दूसरे नेताओं को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
छह शिक्षक सीटों पर नहीं खुला खाता
विधान परिषद की छह शिक्षक निर्वाचन सीटों पर विभिन्न शिक्षक संगठनों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन किसी भी संगठन को जीत नहीं मिली। माध्यमिक शिक्षक संघ के चंदेल, पांडेय और शर्मा गुट के प्रत्याशी भी चुनाव में सफल नहीं हो सके।
वाराणसी शिक्षक सीट से माध्यमिक शिक्षक संघ के चंदेल गुट के प्रदेश अध्यक्ष चेतनारायण सिंह को 3,471 वोट मिले। लखनऊ शिक्षक सीट पर एकजुट गुट के प्रदेश अध्यक्ष सोहन लाल वर्मा को 1,940 वोट मिले। वहीं, पांडेय गुट के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार पटेल को वाराणसी शिक्षक सीट पर 1,088 वोट ही प्राप्त हुए। इन आंकड़ों से शिक्षक संगठनों के सामने खड़ी चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है।
राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को मिला समर्थन
इस चुनाव में भाजपा और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी अपनी स्थिति मजबूत रखी। भाजपा ने शिक्षक वर्ग की छह में से चार सीटें जीतीं, जबकि सपा को दो सीटों पर सफलता मिली। गोरखपुर-फैजाबाद और आगरा शिक्षक सीटों पर भी राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों ने मुकाबले में जीत दर्ज की।
शिक्षक संगठनों की हार के पीछे संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व में बदलाव और उम्मीदवारों के चयन जैसे कारणों की चर्चा हो रही है। हालांकि, इन कारणों के प्रभाव को लेकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विस्तृत विश्लेषण जरूरी है।
शिक्षक राजनीति के सामने नई चुनौती
इस चुनाव के नतीजों ने शिक्षक संगठनों के सामने अपने संगठन को मजबूत करने और शिक्षकों के बीच भरोसा दोबारा कायम करने की चुनौती रखी है। लंबे समय तक विधान परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों को अब यह समझना होगा कि शिक्षक मतदाताओं की प्राथमिकताएं किस तरह बदल रही हैं।
आगामी समय में शिक्षकों की पुरानी मांगों, सेवा शर्तों, वेतन और पेंशन जैसे मुद्दों पर संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल, एमएलसी चुनाव का परिणाम उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में सामने आया है।