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एटा में 21 साल बाद पुलिसकर्मी पिता की मौत का इंसाफ, दरोगा-सिपाही को उम्रकैद

 

जिले में करीब 21 साल पुराने पुलिस हिरासत में मौत के मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। मामले में दोषी पाए गए तत्कालीन दरोगा और सिपाही को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। लंबे समय तक चले मुकदमे के बाद आए इस फैसले से मृतक के परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। मामले में मृतक के बेटे ने आरोप लगाया था कि पुलिस थाने के अंदर उसके पिता के साथ मारपीट कर रही थी। बेटे के अनुसार, थाने से पिता की चीखें बाहर तक सुनाई दे रही थीं। परिवार ने उस समय पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए थे।

थाने में पिटाई का लगाया था आरोप

मामला करीब 21 साल पहले का है। आरोप था कि पुलिस ने मृतक को हिरासत में लिया था। इसी दौरान उसके साथ थाने के अंदर मारपीट की गई। मृतक के बेटे का कहना था कि उसने अपने पिता की चीखें सुनी थीं।परिवार की ओर से पुलिसकर्मियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए और मामले में कानूनी लड़ाई शुरू हुई। लंबे समय तक चली जांच और सुनवाई के बाद अदालत ने मामले में अपना फैसला सुनाया।

दरोगा और सिपाही दोषी करार

अदालत ने मामले में तत्कालीन दरोगा और सिपाही को दोषी माना। दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। कोर्ट के फैसले के बाद 21 साल से चल रही कानूनी लड़ाई में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया है।अदालत में मामले से जुड़े साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को महत्वपूर्ण माना गया। अभियोजन पक्ष ने पुलिसकर्मियों पर लगे आरोपों को साबित करने के लिए उपलब्ध साक्ष्य अदालत के सामने रखे।

21 साल तक परिवार ने लड़ी कानूनी लड़ाई

मृतक के परिवार ने लंबे समय तक न्याय के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी। इतने वर्षों के बाद अदालत का फैसला आने से परिवार को राहत मिली है।परिवार का आरोप था कि पुलिस हिरासत में हुई मारपीट के कारण उनके पिता की मौत हुई। मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे।

फैसले के बाद जवाबदेही पर जोर

इस मामले का फैसला पुलिस हिरासत में लोगों के साथ व्यवहार और पुलिसकर्मियों की जवाबदेही के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानून के मुताबिक हिरासत में मौजूद व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की होती है।अदालत के फैसले के बाद अब दोषी ठहराए गए दोनों पुलिसकर्मियों को सजा भुगतनी होगी। वहीं, 21 साल से इंसाफ का इंतजार कर रहे परिवार के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।21 साल पुराने मामले में आए इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि हिरासत में किसी व्यक्ति के साथ कथित ज्यादती के मामलों में जवाबदेही तय करना कितना जरूरी है।