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कैलाश मानसरोवर यात्रा में क्या है लिपुलेख पास, जिसपर नेपाल खड़ा कर रहा विवाद

 

कैलाश मानसरोवर यात्रा को हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में अत्यंत पवित्र तीर्थयात्रा माना जाता है। इस यात्रा के कई मार्ग हैं, जिनमें से एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक रूप से संवेदनशील रास्ता लिपुलेख पास है। यही मार्ग अब भारत-नेपाल के बीच कूटनीतिक चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।

क्या है लिपुलेख पास?

Lipulekh Pass हिमालय में स्थित एक ऊंचा पर्वतीय दर्रा है, जो भारत के उत्तराखंड राज्य को तिब्बत (चीन) से जोड़ता है। यह दर्रा समुद्र तल से लगभग 5,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है और ऐतिहासिक रूप से व्यापार और तीर्थयात्रा दोनों के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

भारत की ओर से यह पास उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के निकट स्थित है और कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्गों में से एक है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा में इसकी अहमियत

Mount Kailash और मानसरोवर झील तक पहुंचने के लिए यह मार्ग अपेक्षाकृत छोटा और सड़क से जुड़ा हुआ है। भारत सरकार ने पिछले वर्षों में इस मार्ग को विकसित कर यात्रा को आसान बनाने की कोशिश की है।

इस रास्ते से तीर्थयात्री पहले भारत से होते हुए लिपुलेख पास पार करते हैं, फिर तिब्बत क्षेत्र में प्रवेश कर कैलाश मानसरोवर तक पहुंचते हैं।

नेपाल क्यों कर रहा है आपत्ति?

नेपाल का दावा है कि लिपुलेख क्षेत्र और आसपास का कुछ इलाका उसके मानचित्र में आता है। नेपाल सरकार का कहना है कि भारत द्वारा इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और यात्रा मार्ग का विकास उसके क्षेत्रीय अधिकारों का उल्लंघन है।

इसी आधार पर नेपाल समय-समय पर इस क्षेत्र को लेकर आपत्ति जताता रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव की स्थिति बन जाती है।

भारत का रुख

भारत का कहना है कि लिपुलेख पास और आसपास का क्षेत्र उसके प्रशासनिक नियंत्रण में है और यह ऐतिहासिक रूप से उत्तराखंड का हिस्सा रहा है। भारत यह भी कहता है कि यह मार्ग सदियों से व्यापार और धार्मिक यात्राओं के लिए इस्तेमाल होता आया है।

रणनीतिक महत्व भी बड़ा कारण

लिपुलेख सिर्फ धार्मिक यात्रा के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह चीन की सीमा के पास स्थित है। यही वजह है कि इस क्षेत्र को लेकर भारत, नेपाल और चीन—तीनों देशों की दिलचस्पी बनी रहती है।