“स्त्री केवल शरीर नहीं, सृजन की दिव्य चेतना” : गुलाब कोठारी
वरिष्ठ चिंतक और लेखक Gulab Kothari ने कहा है कि स्त्री को केवल शरीर या सामाजिक भूमिका तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि वह सृजन की दिव्य चेतना है, जो जीवन और संस्कृति की मूल आधारशिला है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में स्त्री को हमेशा शक्ति, संवेदना और सृजन के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया गया है।
अपने संबोधन में गुलाब कोठारी ने कहा कि आधुनिक समाज में स्त्री की भूमिका को समझने के लिए केवल भौतिक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। भारतीय संस्कृति स्त्री को ऊर्जा और चेतना का स्रोत मानती है, जो परिवार, समाज और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में स्त्री सशक्तिकरण की चर्चा अक्सर अधिकारों और समानता तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक सशक्तिकरण उसके आत्मबोध, सम्मान और आंतरिक चेतना को पहचानने में निहित है। समाज को स्त्री को केवल जिम्मेदारियों के दायरे में नहीं, बल्कि सृजन और संवेदनशीलता की शक्ति के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
गुलाब कोठारी ने भारतीय परंपरा और दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां स्त्री को ‘शक्ति’ का स्वरूप माना गया है। उन्होंने कहा कि जीवन की निरंतरता और समाज की स्थिरता स्त्री की चेतना और उसकी संवेदनशीलता पर आधारित है।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उनके विचारों को गंभीरता से सुना और भारतीय संस्कृति में स्त्री की भूमिका पर चर्चा की। कई वक्ताओं ने भी इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक समाज में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण को और अधिक संवेदनशील और सम्मानजनक बनाने की जरूरत है।
उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को समझें तथा स्त्री के सम्मान और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
कुल मिलाकर, गुलाब कोठारी का यह वक्तव्य स्त्री की भूमिका को केवल सामाजिक दायरे से आगे बढ़ाकर उसे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सृजनात्मक शक्ति के रूप में देखने का संदेश देता है।