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रात 8 बजे की शांत गलियों में अंतिम यात्रा का दृश्य, गांव में छाया शोक का माहौल

 

रात के करीब 8 बजे का समय था। गांव की गलियां शांत थीं, लेकिन एक घर की ओर बढ़ता हुआ समूह इस सन्नाटे को तोड़ रहा था। कई पुरुष सिर पर सफेद कपड़ा बांधे धीरे-धीरे एक घर की तरफ बढ़ रहे थे, जबकि उनके साथ चल रही महिलाएं पारंपरिक गीत गा रही थीं। दूर से देखने पर यह दृश्य किसी उत्सव जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी।

यह पूरा दृश्य एक अंतिम यात्रा का हिस्सा था। लोग धीरे-धीरे उस घर तक पहुंचे, जहां आंगन में एक बुजुर्ग महिला का शव रखा हुआ था। जैसे ही अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हुईं, माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया।

परंपरा के अनुसार महिलाएं गीत गा रही थीं, लेकिन उन गीतों में खुशी नहीं, बल्कि विदाई का दर्द झलक रहा था। पुरुषों की आंखों में आंसू और चेहरे पर सन्नाटा साफ दिखाई दे रहा था।

गांव के लोगों के अनुसार, बुजुर्ग महिला का निधन सामान्य परिस्थितियों में हुआ था, लेकिन उनकी सामाजिक भूमिका और परिवार में उनका स्थान बहुत अहम था। इसी वजह से अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

धीरे-धीरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ी और आंगन में मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो उठा। गांव में इस समय शांति के साथ एक गहरा शोक भी पसरा हुआ था।

यह दृश्य एक बार फिर यह दिखाता है कि ग्रामीण परंपराओं में मृत्यु केवल एक अंत नहीं, बल्कि सामूहिक भावनाओं और रीति-रिवाजों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण क्षण होता है, जहां दुख भी एक साथ साझा किया जाता है।

गांव में देर रात तक शोक का माहौल बना रहा और लोग परिवार को ढांढस बंधाने के लिए घर पर आते-जाते रहे।