सांचौर के डावल में जीवंत है रियासतकालीन होली परंपरा, धुलंडी पर उमड़ा आस्था और उल्लास का सैलाब
रंग, उमंग और आस्था का अद्भुत संगम इस बार भी डावल गांव में देखने को मिला, जहां रियासतकाल से चली आ रही होली की ऐतिहासिक परंपरा आज भी उसी गरिमा और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है। धुलंडी के अवसर पर गांव में ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि मुख्य चौक से लेकर संकरी गलियों तक उत्सव का रंग छा गया।
प्रातःकाल बिश्नोई समाज के श्रद्धालु सामूहिक रूप से डावल स्थित जम्भेश्वर चौकी पर ‘पाहल’ लेकर पहुंचे। आराध्य देव के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हुए विधिवत पूजा-अर्चना की गई और परंपरा का निर्वहन किया गया। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान पूरे वातावरण में भक्ति और आस्था का भाव स्पष्ट रूप से झलक रहा था।
परंपरा और अनुशासन की मिसाल
स्थानीय लोगों के अनुसार डावल की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। वर्षों पुरानी इस परंपरा में गांववासी सामूहिक रूप से भाग लेते हैं और हर आयोजन निश्चित रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न होता है।
धार्मिक कार्यक्रम संपन्न होने के बाद पूरे गांव में रंगों की बौछार शुरू हो गई। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी होली के रंग में सराबोर नजर आए। मुख्य चौक पर डीजे की धुन गूंज उठी, जिस पर युवाओं ने जमकर नृत्य किया। एक-दूसरे को गुलाल लगाकर लोगों ने पर्व की शुभकामनाएं दीं।
सौहार्द और उत्साह का माहौल
गांव में उत्सव का माहौल सुबह से लेकर दोपहर तक चरम पर रहा। महिलाएं पारंपरिक परिधान में नजर आईं और घर-घर मिठाइयों का आदान-प्रदान हुआ। रंगों के बीच भी अनुशासन और मर्यादा का विशेष ध्यान रखा गया, जो इस आयोजन की विशेष पहचान है।
ग्रामीणों का कहना है कि रियासतकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है। समय के साथ साधन बदले हैं, लेकिन आस्था और परंपरा की भावना में कोई कमी नहीं आई है।
डावल गांव की होली ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम भी हैं। यहां आस्था और उल्लास का जो संगम देखने को मिला, उसने इस पर्व को और भी विशेष बना दिया।