‘द ग्रेट इंडियन फैमिन 1899’: भूख और बीमारियों ने ली लाखों जानें, इम्पीरियल गज़ेटियर में दर्ज हुआ दर्दनाक सच
द ग्रेट इंडियन फैमिन 1899 भारतीय इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक माना जाता है। राजस्थान में इसे “छप्पनिया अकाल” के नाम से याद किया जाता है। इस अकाल की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन 1908 में प्रकाशित इम्पीरियल गज़ेटियर ऑफ इंडिया में छपे एक अनुमान के अनुसार, अकेले ब्रिटिश भारत यानी सीधे अंग्रेज़ी शासन वाले इलाकों में करीब 10 लाख लोगों की मौत भुखमरी और उससे जुड़ी बीमारियों के कारण हुई थी।
वर्ष 1898-99 में पड़े इस अकाल ने राजस्थान, मध्य भारत, गुजरात और तत्कालीन बॉम्बे प्रेसिडेंसी सहित देश के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था। लगातार सूखा पड़ने और मानसून विफल होने के कारण खेतों में फसल नहीं हुई, जल स्रोत सूख गए और अनाज का संकट गहरा गया। लोगों के सामने भोजन और पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया।
राजस्थान के थार, मारवाड़, बीकानेर और जैसलमेर क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं। गांवों में भुखमरी की स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि लोग जीवित रहने के लिए पेड़ों की छाल, जंगली घास और सूखे बीज खाने को मजबूर हो गए थे। हजारों परिवारों ने अपने गांव छोड़ दिए और पलायन शुरू कर दिया।
इतिहासकारों के अनुसार अकाल के साथ महामारी और बीमारियों ने भी भारी तबाही मचाई। कुपोषण और कमजोर शरीर के कारण लोग बीमारियों का सामना नहीं कर पाए। चिकित्सा सुविधाओं की कमी और सीमित राहत व्यवस्था ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।
ब्रिटिश भारतीय प्रशासन की नीतियों को लेकर भी इतिहास में सवाल उठते रहे हैं। कई इतिहासकारों का मानना है कि राहत कार्यों की धीमी गति और संसाधनों की कमी के कारण लाखों लोगों को समय पर सहायता नहीं मिल सकी। उस समय अनाज की कीमतें आसमान छू रही थीं और आम लोगों के लिए भोजन जुटाना लगभग असंभव हो गया था।
इस भीषण अकाल का असर केवल जनजीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन पर भी भारी पड़ा। बड़ी संख्या में पशुओं की मौत हो गई, जिससे कृषि और पशुपालन आधारित समाज पूरी तरह कमजोर पड़ गया।
राजस्थान के लोकगीतों और लोककथाओं में आज भी “छप्पनिया अकाल” का दर्द जीवित है। बुजुर्ग पीढ़ियां इस त्रासदी को मानव इतिहास के सबसे कठिन दौरों में से एक मानती हैं। यह अकाल आज भी इस बात की याद दिलाता है कि पानी, अनाज और संसाधनों का संरक्षण किसी भी समाज के अस्तित्व के लिए कितना महत्वपूर्ण होता है।