‘छप्पनिया अकाल’ में मौत का भयावह आंकड़ा, कुछ इतिहासकारों ने 40 से 45 लाख मौतों का जताया अनुमान
छप्पनिया अकाल भारतीय इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में गिना जाता है। वर्ष 1898-99 में पड़े इस अकाल ने खासतौर पर राजस्थान और थार क्षेत्र को गहरे संकट में डाल दिया था। जहां ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों और इम्पीरियल गज़ेटियर ऑफ India में लगभग 10 लाख मौतों का अनुमान दर्ज है, वहीं कुछ इतिहासवेत्ता मानते हैं कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक था।
इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार इस अकाल में राजस्थान की कुल आबादी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ और भूख, बीमारी तथा पलायन के कारण मरने वालों की संख्या 40 से 45 लाख तक पहुंच गई थी। हालांकि इन आंकड़ों को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद भी हैं, लेकिन इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि “छप्पनिया अकाल” राजस्थान के इतिहास की सबसे विनाशकारी मानवीय त्रासदियों में से एक था।
उस दौर में लगातार सूखा पड़ने से खेती पूरी तरह चौपट हो गई थी। तालाब, कुएं और जल स्रोत सूख चुके थे। गांवों में अनाज खत्म हो गया और पशुओं के लिए चारा तक उपलब्ध नहीं था। हालात इतने भयावह हो गए कि हजारों परिवार गांव छोड़कर दूसरे इलाकों की ओर पलायन करने लगे।
लोक इतिहास और ग्रामीण कथाओं में उल्लेख मिलता है कि लोग भूख मिटाने के लिए पेड़ों की छाल, जंगली पौधे और सूखे बीज तक खाने को मजबूर हो गए थे। कई स्थानों पर पूरे-के-पूरे गांव खाली हो गए। पशुधन की भारी मौत ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी।
इतिहासकारों का मानना है कि उस समय संचार और रिकॉर्ड रखने की सीमित व्यवस्था के कारण मौतों का वास्तविक आंकड़ा कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका। कई दूरदराज क्षेत्रों में हुई मौतें आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं हो पाईं। इसी वजह से कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि सरकारी आंकड़े वास्तविक त्रासदी से काफी कम थे।
अकाल के साथ महामारी और बीमारियों ने भी बड़ी संख्या में लोगों की जान ली। कुपोषण और भूख के कारण कमजोर हुए लोग बीमारियों का सामना नहीं कर पाए। चिकित्सा सुविधाओं और राहत कार्यों की कमी ने स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया।
राजस्थान के लोकगीतों, कहावतों और लोकस्मृतियों में आज भी “छप्पनिया अकाल” का दर्द जिंदा है। यह त्रासदी केवल भूख की कहानी नहीं, बल्कि मानव संघर्ष, जीवटता और कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस अकाल ने राजस्थान में जल संरक्षण और सामुदायिक संसाधनों के महत्व को नई पहचान दी। इसके बाद पारंपरिक जल स्रोतों—तालाब, बावड़ी और कुओं—को बचाने और विकसित करने पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।