अजमेर दरगाह मामले में हस्ताक्षर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई पक्षकार न होने की बात
अजमेर दरगाह से जुड़े विवादित मामले में रोक लगाने की मांग को लेकर दायर की गई हस्ताक्षर याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान माननीय मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता इस मामले में पक्षकार नहीं है, इसलिए उसकी इंटरवेंशन एप्लीकेशन को मंजूरी नहीं दी जा सकती और उसे मामले में पार्टी भी नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को आवेदन वापस लेने का विकल्प दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी एप्लीकेशन वापस ले ली। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि केवल वही व्यक्ति या संस्था मामले में पक्षकार हो सकती है, जो सीधे या कानूनी रूप से मामले से प्रभावित हो।
जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अजमेर दरगाह में किसी गतिविधि पर रोक लगाने की मांग करते हुए हस्ताक्षर याचिका दायर की थी। लेकिन अदालत ने इसे मामला से अप्रासंगिक और पक्षकार न होने के कारण अस्वीकार कर दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की इंटरवेंशन याचिकाएं केवल तभी स्वीकार्य होती हैं, जब याचिकाकर्ता का मामला से प्रत्यक्ष या कानूनी संबंध हो। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायालय प्रक्रिया में पारदर्शिता और पक्षकारों की सीमाओं का पालन आवश्यक है।
वकीलों का कहना है कि इस मामले में अदालत ने यह संदेश दिया है कि सार्वजनिक हित से जुड़ी याचिकाओं में भी प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं का पालन होना चाहिए। केवल हस्ताक्षरों या सामाजिक दबाव के आधार पर किसी मामले में दखल देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई के बाद मामला अब पहले की तरह ही आगे बढ़ेगा, जिसमें केवल मुख्य पक्षकारों और प्रभावित पक्षों के दावे और तर्कों पर विचार किया जाएगा। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि अदालत किसी भी मामले में केवल वैध और सीधे प्रभावित पक्षों की सुनवाई करती है।
इस सुनवाई से यह भी संकेत मिलता है कि कोर्ट की प्रक्रिया में पक्षकार की पहचान, कानूनी अधिकार और याचिका की वैधता प्रमुख आधार होते हैं। याचिकाकर्ता द्वारा एप्लीकेशन वापस लेने के बाद मामला अब मुख्य मुद्दों पर केंद्रित रहेगा।
इस प्रकार, अजमेर दरगाह से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल सीधे प्रभावित पक्षकार ही मामले में अपनी दलील रख सकते हैं। हस्ताक्षर याचिका को अपर्याप्त पक्षकार मानते हुए अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया और याचिकाकर्ता को आवेदन वापस लेने का विकल्प दिया।