राजस्थान की अजीब प्रथा जहां रावण की होती है पूजा, दशहरे पर नहीं मनाते जश्न
राजस्थान अपनी अनूठी परंपराओं और सदियों पुरानी लोक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। प्रदेश में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो बाकी देश से बिल्कुल अलग नजर आती हैं। इन्हीं में से एक है रावण की पूजा की परंपरा। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के कुछ इलाकों में रावण को पूजनीय माना जाता है।
जोधपुर से जुड़ी है खास मान्यता
राजस्थान के जोधपुर में रावण को लेकर एक अलग लोक मान्यता प्रचलित है। कुछ स्थानीय परंपराओं में रावण को भगवान शिव का परम भक्त और विद्वान माना जाता है। मान्यता है कि रावण का संबंध जोधपुर के मंडोर क्षेत्र से था और उसका विवाह मंदोदरी से हुआ था, जिन्हें स्थानीय परंपरा में मंडोदरी का मायका माना जाता है।इसी वजह से कुछ समुदाय रावण को अपने कुल या पूर्वज से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं और उसकी पूजा करते हैं।
दशहरे पर नहीं जलाया जाता रावण
देशभर में दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। लेकिन जिन समुदायों में रावण को पूजनीय माना जाता है, वहां रावण दहन को लेकर अलग परंपरा देखने को मिलती है।कुछ लोग दशहरे के दिन रावण की पूजा करते हैं और उसके पुतले का दहन नहीं करते। उनके लिए यह दिन रावण के ज्ञान, शिवभक्ति और विद्वता को याद करने का अवसर होता है।
रावण को क्यों मानते हैं विद्वान?
लोककथाओं में रावण को केवल लंका के राजा और रामायण के खलनायक के रूप में नहीं देखा जाता। उसे महान शिवभक्त, विद्वान और संगीत का जानकार भी बताया गया है।मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव की स्तुति में शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी। यही वजह है कि कुछ परंपराओं में उसके विद्वान और शिवभक्त स्वरूप को विशेष महत्व दिया जाता है।
मंदोदरी से जुड़ा है जोधपुर का रिश्ता
रावण की पूजा से जुड़ी राजस्थान की लोक मान्यताओं में मंदोदरी का भी विशेष स्थान है। स्थानीय मान्यता के अनुसार मंदोदरी का संबंध मंडोर से था और रावण का विवाह यहीं से जुड़ा माना जाता है।इसी कारण जोधपुर के मंडोर क्षेत्र को रावण और मंदोदरी की कथा से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इन मान्यताओं के कई हिस्से लोककथाओं और स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं, जिन्हें ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करने से पहले स्रोतों की पुष्टि जरूरी है।
राजस्थान में सिर्फ रावण ही नहीं, कई लोक परंपराएं अनोखी
राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कई अलग रूप देखने को मिलते हैं। कहीं किसी विशेष देवी-देवता की अनोखी पूजा होती है तो कहीं किसी ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र को स्थानीय परंपरा में अलग सम्मान दिया जाता है।रावण की पूजा की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण है। यहां रावण को रामायण के नकारात्मक पात्र के बजाय उसके विद्वान और शिवभक्त स्वरूप के आधार पर सम्मान देने की मान्यता देखने को मिलती है।