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राजस्थान उच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा में सामुदायिक भवन भूमि आवंटन पर रोक लगाई

 

राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर ने भीलवाड़ा में सामुदायिक भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित भूमि आवंटन को निरस्त करने के नगर विकास न्यास (UID) के फैसले पर रोक लगा दी है। इस आदेश से भीलवाड़ा के रंगरेज समाज को बड़ी राहत मिली है।

न्यायमूर्ति कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यूआईटी (नगर विकास न्यास) की ओर से भूमि आवंटन को निरस्त करने के फैसले पर रोक लगाने का आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि मामले की पूर्ण और गहन सुनवाई से पहले किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

रंगरेज समाज के लिए यह निर्णय खास महत्व रखता है, क्योंकि उनके लिए प्रस्तावित सामुदायिक भवन का निर्माण कई वर्षों से योजना के तहत लंबित था। भूमि आवंटन निरस्त होने के बाद समाज के लोग इस योजना के स्थगित होने और वर्षों की मेहनत पर पानी फिरने की चिंता में थे। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उनकी चिंता दूर हुई और समुदाय में राहत की लहर दौड़ गई।

याचिका में समाज ने यह तर्क रखा कि भूमि का आवंटन नियम और कानून के अनुरूप किया गया था और नगर विकास न्यास का निरस्तीकरण निर्णय अनुचित और अन्यायपूर्ण था। उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक सुनवाई में इस तर्क को महत्व दिया और फिलहाल भूमि आवंटन को वैध मानते हुए कोई बदलाव न करने का निर्देश दिया।

वहीं, नगर विकास न्यास ने कोर्ट को बताया कि भूमि आवंटन प्रक्रिया में कुछ नियमों और औपचारिकताओं का पालन आवश्यक था, जिसे लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर गहन सुनवाई की जाएगी, लेकिन तब तक किसी भी पक्ष को नुकसान नहीं पहुँचने दिया जाएगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के आदेश समाजों और समुदायों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि प्रशासनिक फैसलों को चुनौती देने के लिए लोगों के पास कानूनी रास्ता खुला रहे और उनके हितों की रक्षा हो सके।

भीलवाड़ा के रंगरेज समाज के नेताओं ने उच्च न्यायालय के आदेश को न्याय और लोकतंत्र का सम्मान बताते हुए कहा कि यह निर्णय उनके समुदाय के लिए आशा और उम्मीद का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सामुदायिक भवन का निर्माण उनके सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।

अंततः, राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर का यह आदेश रंगरेज समाज और अन्य हितधारकों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत और न्याय का उदाहरण साबित हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भूमि आवंटन या निरस्तीकरण जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक निर्णयों पर तत्काल कार्रवाई करने से पहले कानूनी प्रक्रियाओं और सुनवाई का पालन आवश्यक है।