राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य पशु ऊंट की घटती संख्या पर जताई नाराजगी, सरकार को चेतावनी
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य पशु ऊंट की लगातार घटती संख्या पर शनिवार को नाराजगी जाहिर की। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऊंट संरक्षण कानून बनने के बावजूद इनकी संख्या आधी रह गई है, लेकिन राज्य सरकार इस पर गंभीर ध्यान नहीं दे रही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला गंभीरता से लिया जाना चाहिए और सरकार को उचित कदम उठाने होंगे।
हाईकोर्ट इस मामले में स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार को चेतावनी दी कि ऊंटों के संरक्षण और उनके आवासीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसका क्रियान्वयन भी सुनिश्चित होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इस मामले में जवाब पेश करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की। अदालत ने सरकार के अनुरोध पर फिलहाल मामले की अगली सुनवाई अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी है। कोर्ट ने इस दौरान सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऊंटों की घटती संख्या की वजहों और उनके संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान में ऊंटों की संख्या में गिरावट के पीछे कई कारण हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन, चराई के लिए भूमि की कमी, ऊंटों की प्रजनन दर में कमी और पर्यावरणीय असंतुलन शामिल हैं। इसके अलावा पर्यटन और ऊंट आधारित व्यवसायों में वृद्धि के बावजूद संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
राजस्थान में ऊंट न केवल राज्य का प्रतीक हैं, बल्कि वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऊंटों का मांस, दूध और अन्य उत्पाद ग्रामीण समुदायों की आय का स्रोत हैं, और उनका संरक्षण आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि ऊंट संरक्षण कानून के लागू होने के बाद किन योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से इनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास किया गया। अदालत ने जोर दिया कि केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उच्च न्यायालयों के निर्देशों के बाद राजस्थान सरकार ने अब तक ऊंट संरक्षण को लेकर केवल घोषणात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव सीमित रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य पशु की संख्या और अधिक घट सकती है।
जनहित याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि ऊंटों के लिए सुरक्षित चराई और आवास की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, साथ ही स्थानीय लोगों और किसानों को संरक्षण कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और जैविक विविधता से जुड़ा मामला है। अदालत ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगली सुनवाई में ठोस योजना पेश करनी होगी, अन्यथा अदालत कड़ी कार्रवाई कर सकती है।