राजस्थान विधानसभा में कुम्भाराम लिफ्ट नहर परियोजना को लेकर सियासी उठापटक
राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सदन में जोरदार हलचल मच गई। तारानगर से कांग्रेस विधायक नरेंद्र बुड़ानिया ने कुम्भाराम लिफ्ट नहर परियोजना में कथित भ्रष्टाचार और टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। विधायक ने इस परियोजना से जुड़े टेंडर प्रकरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए, जिससे सदन में विपक्ष और सरकार के बीच सक्रिय बहस छिड़ गई।
विधायक ने कहा कि कुम्भाराम लिफ्ट नहर परियोजना में भ्रष्टाचार और अनुचित टेंडर प्रक्रिया के कारण जनता का भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना में कई अनियमितताएं और पारदर्शिता की कमी देखी गई हैं, जिनकी गंभीर जांच होनी चाहिए।
सदन में कांग्रेस विधायक के इस मुद्दे को उठाने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई। विपक्ष ने इसे सरकार की नियमों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाने का अवसर बताया। वहीं, सत्ता पक्ष ने कहा कि सभी कार्य कानून और नियमों के अनुसार किए जा रहे हैं और आरोपों की जांच के लिए समुचित प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा में इस तरह के मुद्दों को उठाना लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक तरीका है। इससे जनता और मीडिया के सामने प्रशासनिक मामलों की सच्चाई उजागर होती है।
कुम्भाराम लिफ्ट नहर परियोजना राजस्थान में सिंचाई और जल प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस परियोजना में अनियमितताओं के आरोप ने सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इससे परियोजना की गति और विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।
विधायक बुड़ानिया ने सदन में मांग की कि परियोजना में भ्रष्टाचार और टेंडर प्रक्रिया की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनता का पैसा और संसाधन सुरक्षित रहना चाहिए और कोई भी अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मुद्दा विधानसभा में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी को बढ़ा सकता है। साथ ही, जनता के बीच भी इस परियोजना को लेकर सवाल और आशंका उत्पन्न हो सकती है।
इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि राजस्थान विधानसभा में बजट सत्र के दौरान महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं और उनके टेंडर प्रकरणों पर राजनीतिक और कानूनी चर्चा हमेशा सक्रिय रहती है। कुम्भाराम लिफ्ट नहर परियोजना के मामले ने राज्य में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दे को फिर से प्रमुखता से उभारा है।