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सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी से मरीज परेशान, निजी मेडिकल दुकानों के ‘लपके’ सक्रिय

 

राजस्थान में सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी मरीजों पर भारी पड़ रही है। कई अस्पतालों में लगभग 30 प्रतिशत तक दवाइयां आउट ऑफ स्टॉक हैं। इस स्थिति के कारण मरीज इलाज के लिए भटक रहे हैं और वहीं अस्पताल के बाहर कुछ लोग सक्रिय हो कर उन्हें निजी मेडिकल दुकानों तक ले जाते हैं। स्थानीय लोग और मरीज इसे गंभीर समस्या बता रहे हैं।

मरीजों के अनुसार, अस्पताल में कई आवश्यक दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं। जब वे दवा लेने आते हैं और स्टॉक न मिलने की वजह से निराश होते हैं, तब आसपास कुछ लोग “सहायता” का झांसा देकर उन्हें निजी मेडिकल स्टोर तक ले जाते हैं। मरीजों का आरोप है कि इन ‘लपकों’ का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ मुनाफा कमाना है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित न होना गंभीर समस्या है। उन्होंने बताया कि यदि सरकारी अस्पतालों में लोकल परचेज और स्टॉक की जानकारी समय पर उपलब्ध होती, तो मरीजों को भटकने की नौबत नहीं आती और साथ ही यह भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी की संभावना भी कम होती।

अस्पताल प्रशासन ने बताया कि दवाओं की कमी के कई कारण हैं। इनमें भारी मांग, समय पर स्टॉक न पहुंचना, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और कभी-कभी प्रशासनिक लापरवाही शामिल हैं। अधिकारियों ने कहा कि इस स्थिति को सुधारने के लिए ऑनलाइन स्टॉक मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जा रहा है, जिससे मरीजों को पहले से जानकारी मिल सके कि कौन-सी दवाइयां उपलब्ध हैं और कौन-सी आउट ऑफ स्टॉक हैं।

स्थानीय नागरिकों और मरीजों का कहना है कि इस कमी के कारण कई बार उन्हें महंगी दवाइयां निजी मेडिकल दुकानों से खरीदनी पड़ती हैं, जबकि वे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या कम कीमत पर मिल सकती थीं। उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि तुरंत इस समस्या का समाधान किया जाए और मरीजों को भटकने से बचाया जाए।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने कहा कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी अस्पतालों में स्टॉक और वितरण की नियमित जांच की जाएगी। इसके अलावा, स्टाफ को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि मरीजों को सही जानकारी और मार्गदर्शन समय पर प्रदान किया जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं की कमी सिर्फ मरीजों की परेशानी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भी असर डालती है। यदि मरीज समय पर आवश्यक दवाइयां नहीं ले पाते हैं, तो उनकी बीमारी बढ़ सकती है और इलाज लंबित रह सकता है।

यह स्थिति स्पष्ट कर देती है कि सरकारी अस्पतालों में दवा आपूर्ति और स्टॉक की पारदर्शिता सुनिश्चित करना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है। साथ ही, यह भी जरूरी है कि प्रशासन “लपकों” जैसी अवैध गतिविधियों पर रोक लगाकर मरीजों को सुरक्षित और सही तरीके से इलाज मुहैया कराए।

इस समस्या का समाधान स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और तकनीकी निगरानी के माध्यम से किया जा सकता है। तभी मरीजों का भरोसा सरकारी अस्पतालों पर कायम रहेगा और उन्हें निजी मेडिकल दुकानों की ओर मजबूर नहीं होना पड़ेगा।