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राजस्थान विधानसभा में बजट सत्र में जोरदार बहस, विपक्ष और सरकार आमने-सामने

 

राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में बुधवार को पंचायतीराज और ग्रामीण विकास विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान जोरदार बहस देखने को मिली। इस बहस में विपक्ष और सरकार के वरिष्ठ नेता आमने-सामने आए और सदन में सक्रिय बहस का माहौल बना रहा।

सूत्रों के अनुसार, विपक्ष के नेता टीकाराम जूली और पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने बजट में प्रस्तावित योजनाओं और सरकारी खर्चों पर सवाल उठाए। उन्होंने सदन में परिसीमन, ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ और मनरेगा के प्रावधानों को लेकर सरकार को घेरा। उनका कहना था कि ग्रामीण विकास और पंचायतीराज में किए जाने वाले खर्च की पारदर्शिता और प्रभावशीलता सुनिश्चित होनी चाहिए।

विपक्ष के सवालों के जवाब में मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा, मदन दिलावर और संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने जोरदार पलटवार किया। उन्होंने बजट प्रस्तावों का सभी पक्षों और योजनाओं के लाभार्थियों के दृष्टिकोण से समर्थन किया और विपक्ष के सवालों का बारीकी से जवाब दिया।

सदन में बहस का दायरा सिर्फ वित्तीय प्रावधान तक सीमित नहीं रहा। यह बहस दूध योजना, राष्ट्रभक्ति, सरकारी योजनाओं के खर्च और मिड-डे मील जैसी योजनाओं तक पहुंच गई। सदन में नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और तर्क-वितर्क का सिलसिला लगातार चलता रहा।

विशेषज्ञों का कहना है कि बजट सत्र में इस तरह की बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। यह न केवल विपक्ष को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का मौका देता है, बल्कि सरकार को भी अपने निर्णयों की पारदर्शिता और जवाबदेही साबित करने का अवसर मिलता है।

सदन में कई बार चर्चा इतनी गर्म हो गई कि सभापति को सदन की कार्यवाही नियंत्रित करनी पड़ी। नेताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए वित्तीय योजनाओं के लाभ और संभावित खामियों पर प्रकाश डाला।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बहस का असर स्थानीय और ग्रामीण विकास की दिशा पर पड़ सकता है। बजट में किए गए खर्च और नीतिगत निर्णय इस बहस के बाद अधिक पारदर्शी और प्रभावी हो सकते हैं।

अंततः, राजस्थान विधानसभा में बजट सत्र के दौरान पंचायतीराज और ग्रामीण विकास विभाग की अनुदान मांगों पर हुई बहस ने विपक्ष और सरकार के दृष्टिकोण को उजागर किया। सदन में परिसीमन, योजनाओं के खर्च, मिड-डे मील और वन स्टेट वन इलेक्शन जैसे मुद्दों पर हुई बहस ने यह दिखा दिया कि राजनीतिक संवाद और तर्क-वितर्क लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं।