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सावन के पहले सोमवार करें अलवर के नीलकंठ महादेव के दर्शन, पांडवों से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

 

सावन के पहले सोमवार के पावन अवसर पर राजस्थान के अलवर स्थित प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग की स्थापना स्वयं पांडवों ने अपने वनवास काल के दौरान की थी। तभी से यह मंदिर भगवान शिव की आराधना का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

मान्यता है कि पांडव काशी से शिवलिंग लेकर आए थे और उसे अलवर के इस पवित्र स्थल पर स्थापित किया। इसके बाद से यहां नियमित रूप से भगवान शिव की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस मंदिर में सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान भोलेनाथ अवश्य स्वीकार करते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

नीलकंठ महादेव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां जलने वाली अखंड ज्योत है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह ज्योत पांडवों के समय से लगातार प्रज्वलित है। सदियों से जल रही इस अखंड ज्योत को आस्था और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। सावन के महीने में दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु इस ज्योत के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।

सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। विशेष रूप से सावन के सोमवार को शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है। नीलकंठ महादेव मंदिर में भी सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। श्रद्धालुओं ने जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव का अभिषेक किया तथा परिवार की सुख-समृद्धि और मंगलकामना की प्रार्थना की।

मंदिर का शांत और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को विशेष आकर्षित करता है। सावन के दौरान यहां भजन-कीर्तन, रुद्राभिषेक और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाता है। मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'बम-बम भोले' के जयघोष से गूंजता रहता है।

हर वर्ष सावन में हजारों श्रद्धालु नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचकर भगवान शिव के दर्शन करते हैं। धार्मिक आस्था, प्राचीन इतिहास और पांडवों से जुड़ी मान्यताओं के कारण यह मंदिर अलवर ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान के प्रमुख शिव धामों में अपनी अलग पहचान रखता है। सावन के पहले सोमवार पर यहां दर्शन करना भक्तों के लिए विशेष पुण्यदायी माना जाता है।