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पराली और कृषि कचरे से बनेगा कोयले जैसा ईंधन, MPUAT को मिला पेटेंट; हर घंटे 30 किलो कचरे की प्रोसेसिंग

 

खेती के बाद खेतों में बचने वाली पराली और कृषि कचरे का इस्तेमाल अब उपयोगी ईंधन बनाने में किया जा सकेगा। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MPUAT) को ऐसी तकनीक के लिए पेटेंट मिलने की जानकारी सामने आई है, जिसके जरिए कृषि अवशेषों को प्रोसेस कर कोयले जैसा ईंधन तैयार किया जा सकता है। इस तकनीक की बताई गई क्षमता हर घंटे करीब 30 किलोग्राम कृषि कचरे को प्रोसेस करने की है।

यह तकनीक कृषि अवशेषों के बेहतर प्रबंधन और वैकल्पिक ईंधन के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। खेतों में फसल कटाई के बाद बचने वाली पराली और दूसरे अवशेषों का उचित उपयोग नहीं होने पर किसानों के सामने उनके निपटान की समस्या खड़ी हो जाती है। ऐसे में इन अवशेषों को ईंधन में बदलने की तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

हर घंटे 30 किलो कृषि कचरे की प्रोसेसिंग

दी गई जानकारी के अनुसार, इस तकनीक में पराली और अन्य कृषि अवशेषों को एक विशेष प्रक्रिया से गुजारकर ठोस ईंधन तैयार किया जाता है। इसकी क्षमता प्रति घंटे लगभग 30 किलोग्राम कचरे को प्रोसेस करने की बताई गई है।

कोयले जैसे ईंधन का इस्तेमाल कुछ औद्योगिक और ताप संबंधी जरूरतों में किया जा सकता है। हालांकि, तैयार ईंधन की वास्तविक गुणवत्ता, उसकी ऊष्मा क्षमता और अलग-अलग मशीनों या उद्योगों में उपयोग की उपयुक्तता का आकलन तकनीकी परीक्षणों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

पराली जलाने की समस्या से निपटने में मदद

फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली का निपटान किसानों के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है। कई स्थानों पर पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की चिंता भी सामने आती रही है।

यदि कृषि अवशेषों को ईंधन बनाने के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो किसानों को कचरे के उपयोग का एक विकल्प मिल सकता है। साथ ही, कृषि अवशेषों से ऊर्जा तैयार करने की दिशा में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

टॉरिफिकेशन तकनीक से तैयार होगा बेहतर ईंधन

कृषि अवशेषों को बेहतर ठोस ईंधन में बदलने के लिए टॉरिफिकेशन यानी नियंत्रित तापमान पर गर्म करने की प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। ICAR-केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट में MPUAT के उदयपुर केंद्र की ऐसी सतत प्रणाली का उल्लेख है, जिसकी क्षमता 1 से 30 किलोग्राम प्रति घंटे है। इसमें प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले वाष्पशील पदार्थों का दोबारा गर्मी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। रिपोर्ट में धान की भूसी के ईंधन गुणों में सुधार के परिणाम भी बताए गए हैं।

इस तरह की तकनीक का एक प्रमुख उद्देश्य ऊर्जा का बेहतर उपयोग करना और प्रोसेसिंग के दौरान होने वाली ऊर्जा की बर्बादी को कम करना है। हालांकि, अलग-अलग प्रकार के कृषि कचरे से बनने वाले ईंधन की गुणवत्ता अलग हो सकती है।

किसानों और उद्योगों को मिल सकता है लाभ

यदि इस तकनीक का व्यावसायिक स्तर पर उपयोग संभव होता है, तो कृषि अवशेषों को उपयोगी संसाधन में बदलने के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे कृषि कचरे के संग्रहण, प्रसंस्करण और वैकल्पिक ईंधन की आपूर्ति से जुड़े काम भी विकसित हो सकते हैं।

हालांकि, इसके वास्तविक लाभ का आकलन करने के लिए मशीन की लागत, बिजली और अन्य ऊर्जा की खपत, तैयार ईंधन की गुणवत्ता तथा उत्पादन की कुल लागत का अध्ययन जरूरी होगा। पेटेंट मिलने से तकनीक को कानूनी संरक्षण मिलता है, लेकिन बड़े स्तर पर इसका सफल उपयोग उत्पादन और आर्थिक व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा।

महत्वपूर्ण तथ्य: उपलब्ध तकनीकी रिपोर्ट में 30 किलोग्राम प्रति घंटे की क्षमता वाली प्रणाली का उल्लेख है, लेकिन पेटेंट जारी होने की तारीख और पेटेंट नंबर की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। खबर प्रकाशित करने से पहले MPUAT से इन विवरणों की पुष्टि करना उचित होगा।