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राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला: 58 साल की शादी में मामूली विवाद तलाक का आधार नहीं

 

राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण से अहम फैसला सुनाते हुए 75 वर्ष से अधिक आयु के एक बुजुर्ग दंपती की 58 साल पुरानी शादी को तोड़ने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वैवाहिक जीवन में आने वाले मामूली विवाद, मतभेद और उतार-चढ़ाव को क्रूरता का आधार मानकर विवाह विच्छेद नहीं दिया जा सकता।

यह निर्णय उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जो भरतपुर के पारिवारिक न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में दायर की गई थी। पारिवारिक न्यायालय ने पूर्व में तलाक से संबंधित आदेश पारित किया था, जिसे चुनौती देते हुए मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।

संपत्ति विवाद बना था मुख्य कारण

मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि पति-पत्नी के बीच मुख्य विवाद संपत्ति के बंटवारे को लेकर था। दोनों पक्षों के बीच पारिवारिक संपत्ति के अधिकार और हिस्सेदारी को लेकर मतभेद थे, जो समय के साथ बढ़ते गए। हालांकि, अदालत ने माना कि संपत्ति संबंधी विवाद अपने आप में वैवाहिक क्रूरता का प्रमाण नहीं है और इसे तलाक का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लंबे वैवाहिक जीवन में विचारों का मतभेद, पारिवारिक तनाव या आर्थिक मामलों को लेकर असहमति होना असामान्य नहीं है। विशेषकर जब विवाह को 50 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका हो, तो ऐसे मामलों में अदालत को संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

‘क्रूरता’ की कानूनी परिभाषा पर टिप्पणी

उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘क्रूरता’ को साबित करने के लिए गंभीर और ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं। केवल आरोप या सामान्य पारिवारिक तकरार को क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह एक सामाजिक संस्था है, जिसे मामूली कारणों से समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि वृद्धावस्था में दंपती को अलग करना उनके सामाजिक और मानसिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। ऐसे मामलों में अदालत को यह देखना होता है कि क्या वास्तव में वैवाहिक संबंध पूरी तरह से असहनीय हो चुके हैं या फिर विवादों का समाधान संभव है।

पारिवारिक न्यायालय के आदेश को किया निरस्त

उच्च न्यायालय ने भरतपुर पारिवारिक न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए तलाक की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि पति या पत्नी ने एक-दूसरे के साथ ऐसी क्रूरता की हो, जिससे वैवाहिक संबंध समाप्त करना अनिवार्य हो जाए।

सामाजिक दृष्टि से अहम फैसला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश जाता है कि अदालतें विवाह संस्था को बनाए रखने के पक्ष में हैं, खासकर तब जब विवाद गंभीर न हों।

यह निर्णय उन मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहां संपत्ति या पारिवारिक असहमति को आधार बनाकर लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक संबंधों को समाप्त करने की कोशिश की जाती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक जीवन के सामान्य उतार-चढ़ाव को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।