जयपुर फैमिली कोर्ट का फैसला: दूसरे पुरुष के नाम की मेहंदी और उसके लिए करवा चौथ का व्रत करना व्यभिचार, वीडियो में जाने 13 साल पुरानी शादी खत्म
जयपुर की फैमिली कोर्ट-2 ने तलाक के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति की याचिका मंजूर कर ली और दंपती की करीब 13 साल पुरानी शादी खत्म कर दी। अदालत ने कहा कि विवाहित रहते हुए किसी दूसरे पुरुष के लिए करवा चौथ का व्रत करना, उसके नाम की मेहंदी लगाना और उसे पति के रूप में स्वीकार करने जैसा आचरण सामान्य दोस्ती की सीमा से आगे है। कोर्ट ने मामले के तथ्यों के आधार पर इसे व्यभिचार से जुड़ा आचरण माना। साथ ही, पति को लंबे समय तक दांपत्य सहचर्य से वंचित रखना भी मानसिक क्रूरता के दायरे में माना गया।
यह फैसला फैमिली कोर्ट-2 के न्यायाधीश विशाल भार्गव ने सुनाया। दंपती की शादी मई 2013 में हुई थी। पति ने अदालत में तलाक की याचिका दायर कर पत्नी के व्यवहार और वैवाहिक संबंधों से जुड़ी शिकायतें रखी थीं। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों और पक्षकारों के बयानों पर विचार करने के बाद अदालत ने विवाह विच्छेद की अनुमति दे दी।
दूसरे पुरुष के लिए करवा चौथ मनाने का मामला
अदालत के आदेश के मुताबिक, पत्नी ने स्वीकार किया कि उसने दूसरे पुरुष के साथ गोवा में फेरे लिए थे और उसके साथ वैवाहिक संबंध जैसा व्यवहार किया। कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि पत्नी ने उस पुरुष के लिए करवा चौथ का व्रत रखा और अपने हाथ पर उसके नाम की मेहंदी लगाई।अदालत ने इन परिस्थितियों को सामान्य मित्रता से अलग माना। कोर्ट के अनुसार, विवाह के दौरान किसी न्य व्यक्ति को पति के रूप में स्वीकार करने जैसा आचरण वैवाहिक रिश्ते में विश्वास और प्रतिबद्धता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।हालांकि, अदालत के फैसले का आधार केवल किसी एक घटना को नहीं, बल्कि मामले में सामने आए तथ्यों और दंपती के बीच संबंधों की समग्र स्थिति को माना गया।
दांपत्य सहचर्य से वंचित रखना मानसिक क्रूरता
फैसले में अदालत ने कहा कि पति को लंबे समय तक दांपत्य सहचर्य से वंचित रखना भी मानसिक क्रूरता हो सकता है। पति की ओर से वैवाहिक संबंधों में दूरी और पत्नी के व्यवहार को लेकर शिकायतें की गई थीं।कोर्ट ने माना कि वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के बीच भरोसा, आपसी सम्मान और संबंधों को बनाए रखने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। यदि परिस्थितियां ऐसी हो जाएं कि एक पक्ष के लिए वैवाहिक जीवन में मानसिक शांति और विश्वास बनाए रखना मुश्किल हो जाए, तो उन तथ्यों पर तलाक के मामले में विचार किया जा सकता है।
बेटे की देखभाल और सास-ससुर से व्यवहार का भी जिक्र
अदालत ने अपने आदेश में पत्नी के व्यवहार से जुड़े अन्य पहलुओं का भी उल्लेख किया। फैसले के अनुसार, पत्नी ने वैवाहिक दायित्वों का उचित निर्वहन नहीं किया। पति ने नाबालिग बेटे की देखभाल और अपने माता-पिता के साथ पत्नी के कथित अनुचित तथा अपमानजनक व्यवहार को लेकर भी शिकायतें की थीं।कोर्ट ने घटनाओं की पूरी श्रृंखला पर विचार करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों के कारण पति के लिए वैवाहिक जीवन में मानसिक शांति, विश्वास और संबंध बनाए रखना कठिन हो गया था। अदालत ने समग्र परिस्थितियों को मानसिक क्रूरता के रूप में देखा।
13 साल पुराना वैवाहिक रिश्ता समाप्त
मई 2013 में शादी के बंधन में बंधे इस दंपती का रिश्ता अब अदालत के आदेश के बाद समाप्त हो गया। पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट-2 ने विवाह विच्छेद का आदेश दिया।यह मामला वैवाहिक संबंधों में विश्वास, निष्ठा और मानसिक क्रूरता से जुड़े कानूनी पहलुओं को सामने लाता है। हालांकि, ऐसे मामलों में अदालत प्रत्येक प्रकरण के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर फैसला करती है। इसलिए किसी एक मामले के निष्कर्ष को सभी वैवाहिक विवादों पर स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।