धुलंडी पर बाड़मेर के सनावड़ा में गैर की धूम, तीन पीढ़ियों ने एक साथ थिरककर रची विरासत की मिसाल
रेगिस्तानी जिले बाड़मेर के सनावड़ा गांव में धुलंडी के अवसर पर लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। होलिका दहन के अगले दिन आयोजित विश्व प्रसिद्ध गैर नृत्य में परंपरा और आधुनिकता की खूबसूरत झलक दिखाई दी। पारंपरिक लाल-सफेद ‘आंगी’ वेशभूषा में सजे सैकड़ों कलाकारों ने ढोल-थाली की गूंजती थाप पर ऐसा समां बांधा कि पूरा गांव उत्सवमय हो उठा।
सनावड़ा की गैर वर्षों से अपनी विशिष्ट शैली, अनुशासन और सामूहिक प्रस्तुति के लिए जानी जाती है। जैसे ही ढोल की पहली थाप पड़ी, कलाकार गोल घेरा बनाकर लयबद्ध कदमों से थिरकने लगे। हाथों में सजे पारंपरिक डंडों की टकराहट और तालमेल ने वातावरण को रोमांच से भर दिया। दर्शक दीर्घा में मौजूद ग्रामीणों और बाहर से आए मेहमानों ने इस लोक उत्सव का भरपूर आनंद लिया।
‘पीढ़ियों का मिलन’ बना आकर्षण का केंद्र
इस वर्ष के आयोजन की सबसे प्रेरणादायक झलक ‘पीढ़ियों का मिलन’ रही। एक ही परिवार के दादा, पिता और पुत्र ने एक साथ गैर में भाग लेकर प्राचीन परंपरा को जीवंत रखा। तीनों पीढ़ियों की एक साथ कदमताल ने यह संदेश दिया कि लोक संस्कृति केवल मंच की प्रस्तुति नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी जाने वाली धरोहर है।
दादा की अनुभवी चाल, पिता की सधी हुई लय और पुत्र का उत्साह—इन तीनों का संगम दर्शकों के लिए अविस्मरणीय बन गया। जब तीनों एक साथ घेरे में घूमे, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा मैदान गूंज उठा। यह दृश्य न केवल भावुक करने वाला था, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त प्रतीक भी बना।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
गैर नृत्य में जहां पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों की प्रधानता रही, वहीं आयोजन में आधुनिक व्यवस्थाओं की भी झलक देखने को मिली। मंच सज्जा, ध्वनि व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों ने कार्यक्रम को व्यवस्थित स्वरूप दिया। स्थानीय युवाओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया, जिससे यह साफ संदेश मिला कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।
लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव
धुलंडी के अवसर पर आयोजित इस गैर नृत्य ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजस्थान की लोक परंपराएं आज भी पूरे उत्साह और गर्व के साथ निभाई जा रही हैं। सनावड़ा का यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव बन गया।