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विजय स्तंभ का इतिहास: मेवाड़ की शौर्यगाथा का अमर प्रतीक

 

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित विजय स्तंभ भारतीय इतिहास, शौर्य और स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। यह स्मारक मेवाड़ के महान शासक महाराणा कुंभा की ऐतिहासिक विजय की याद में बनवाया गया था। विजय स्तंभ न केवल राजस्थान की पहचान है, बल्कि यह राजपूत वीरता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव का भी प्रतीक माना जाता है।

विजय स्तंभ का निर्माण 1440 से 1448 ईस्वी के बीच महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में करवाया था। यह युद्ध सन् 1437 में सारंगपुर के पास लड़ा गया था, जिसमें महाराणा कुंभा ने निर्णायक जीत हासिल की थी। इसी विजय की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए इस भव्य स्मारक का निर्माण कराया गया।

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करीब 37.2 मीटर (122 फीट) ऊंचा और नौ मंजिला यह स्तंभ लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसके भीतर ऊपर तक जाने के लिए 157 सीढ़ियां बनाई गई हैं। स्तंभ की दीवारों पर भगवान विष्णु, शिव, देवी-देवताओं, योद्धाओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ी सुंदर मूर्तियां एवं नक्काशी उकेरी गई हैं, जो उस समय की उत्कृष्ट शिल्पकला को दर्शाती हैं।

विजय स्तंभ के शीर्ष से पूरे चित्तौड़गढ़ दुर्ग और आसपास के क्षेत्र का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यही कारण है कि यह पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इतिहासकारों के अनुसार, इस स्मारक का निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार जैता तथा उनके पुत्र नापा, पूजा और पेमा की देखरेख में किया गया था।

आज विजय स्तंभ केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि मेवाड़ की वीरता, पराक्रम और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 2013 में चित्तौड़गढ़ दुर्ग को राजस्थान के अन्य पहाड़ी किलों के साथ यूनेस्को की विश्व धरोहर (World Heritage Site) सूची में शामिल किया गया, जिससे विजय स्तंभ की वैश्विक पहचान और भी मजबूत हुई।