☰
×

गाय के गोबर और पराली से बनी ‘गोमय समिधा’ को मिला पेटेंट, हर साल बचेंगे 2 करोड़ पेड़; 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रोकने का दावा

 

गाय के गोबर और पराली से तैयार की गई ‘गोमय समिधा’ को पेटेंट मिल गया है। इसे लकड़ी के पारंपरिक विकल्प के रूप में विकसित किया गया है। दावा है कि इसके इस्तेमाल से हर साल करीब 2 करोड़ पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है। साथ ही, इससे सालाना लगभग 90 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को रोकने में मदद मिल सकती है।

गोमय समिधा को तैयार करने में गाय के गोबर और पराली जैसे कृषि अवशेषों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य इन संसाधनों का उपयोग करके ऐसा विकल्प तैयार करना है, जिससे धार्मिक और अन्य पारंपरिक कार्यों में लकड़ी पर निर्भरता कम की जा सके।

गोबर और पराली से तैयार होती है समिधा

गोमय समिधा में गाय के गोबर और खेतों में बचने वाली पराली का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर पराली को खेतों में जलाने से वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती है। वहीं, गोबर का उपयोग भी कई पारंपरिक कार्यों में होता रहा है।

इन दोनों संसाधनों को मिलाकर तैयार की गई समिधा कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग का एक विकल्प पेश करती है। इससे पराली के उपयोग को बढ़ावा देने और लकड़ी की खपत कम करने की संभावना जताई जा रही है।

हर साल 2 करोड़ पेड़ बचाने का दावा

गोमय समिधा को लेकर दावा किया गया है कि इसके व्यापक इस्तेमाल से हर साल करीब 2 करोड़ पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है। इसका कारण पारंपरिक समिधा और अन्य कार्यों में लकड़ी की जगह गोबर-पराली से बने उत्पाद का इस्तेमाल होना है।

यदि बड़े स्तर पर इसका उपयोग होता है तो लकड़ी की मांग कम करने में मदद मिल सकती है। इससे जंगलों पर पड़ने वाले दबाव को घटाने की संभावना भी है।

90 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन रोकने का अनुमान

इस उत्पाद से हर साल करीब 90 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन रोकने का दावा भी किया गया है। हालांकि, यह आंकड़ा किस आधार पर तैयार किया गया है और इसकी गणना में किन परिस्थितियों को शामिल किया गया है, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

कार्बन उत्सर्जन में कमी का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि गोमय समिधा का उत्पादन और इस्तेमाल किस स्तर पर होता है तथा यह पारंपरिक लकड़ी का कितना विकल्प बन पाती है।

पेटेंट मिलने से बढ़ सकती है उपयोग की संभावनाएं

गोमय समिधा को पेटेंट मिलना इसके विकास और तकनीकी पहचान के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे गोबर और पराली आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने की संभावनाएं बन सकती हैं।

फिलहाल इसके उत्पादन की क्षमता, पेटेंट धारक संस्था, पेटेंट नंबर और व्यावसायिक स्तर पर उपलब्धता से जुड़ी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। इसके बावजूद गोमय समिधा को कृषि अवशेषों के उपयोग और लकड़ी के विकल्प के तौर पर विकसित एक पहल के रूप में देखा जा रहा है।