जालौर में ‘ढूंढों उत्सव’ की धूम, नवजातों के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ निभाई जाती है परंपरा
होली के उल्लास के बीच जालौर जिले में मनाया जाने वाला ‘ढूंढों उत्सव’ आज भी अपनी अनोखी लोक परंपरा और पारिवारिक आनंद के लिए विशेष पहचान रखता है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा जिले के गांवों और कस्बों में पूरे उत्साह और आस्था के साथ निभाई जाती है। इस आयोजन में परिवार और समाज के लोग एकजुट होकर नवजात शिशुओं के स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
ढूंढों उत्सव मुख्य रूप से उन बच्चों के लिए मनाया जाता है, जिनका जन्म पिछले एक वर्ष के दौरान हुआ हो। होली के दूसरे दिन धुलंडी के अवसर पर यह आयोजन किया जाता है। सुबह से ही परिवारों में उत्साह का माहौल रहता है। नवजात को नए वस्त्र पहनाकर विशेष रूप से सजाया जाता है और घर के आंगन या मोहल्ले में पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं।
लोक गीतों और आशीर्वाद की गूंज
उत्सव के दौरान महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और बच्चे को गोद में लेकर उसके चारों ओर घेरा बनाकर मंगलकामनाएं करती हैं। कई स्थानों पर बच्चे के ऊपर से प्रतीकात्मक रूप से रंग या गुलाल घुमाया जाता है, जिससे माना जाता है कि नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और बालक का जीवन खुशियों से भरा रहता है।
परिवार के बुजुर्ग बच्चे को आशीर्वाद देते हुए उसके उज्ज्वल भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना करते हैं। इस अवसर पर रिश्तेदार और पड़ोसी भी आमंत्रित किए जाते हैं, जिससे सामाजिक एकता और पारिवारिक संबंध और मजबूत होते हैं।
सामाजिक एकता का प्रतीक
ढूंढों उत्सव केवल एक पारिवारिक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। गांवों में सामूहिक रूप से यह आयोजन होने से आपसी भाईचारा और अपनापन बढ़ता है। कई स्थानों पर सामूहिक भोज का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें पूरा मोहल्ला या गांव शामिल होता है।
परंपरा से जुड़ी नई पीढ़ी
बदलते समय के बावजूद जालौर में यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह से निभाई जा रही है। युवा पीढ़ी भी इस आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग ले रही है, जिससे यह लोक परंपरा जीवंत बनी हुई है।
होली के रंगों के बीच ‘ढूंढों उत्सव’ जालौर की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अध्याय है, जो परिवार, समाज और परंपरा को एक सूत्र में पिरोता है। यह उत्सव न केवल नवजीवन का स्वागत है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति आशा और आशीर्वाद का भी प्रतीक है।