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फसल विविधीकरण से घटेगा खेती का जोखिम, बढ़ेगी किसान की आय

 

राजस्थान में कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा देने की आवश्यकता को लेकर विशेषज्ञों और अधिकारियों ने जोर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एक ही फसल पर निर्भर रहने से किसानों का आर्थिक जोखिम बढ़ जाता है, जबकि फसल विविधीकरण से न केवल जोखिम कम होता है बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होती है।

फसल विविधीकरण का मतलब है कि किसान अपने खेत में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाएं। उदाहरण के लिए, गेहूं या बाजरे के अलावा दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती भी की जाए। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कृषि क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। अगर एक फसल किसी कारण से नष्ट हो जाए, तो अन्य फसलें नुकसान को कम कर सकती हैं।

राजस्थान के कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य के कई जिलों में अभी भी किसान मुख्य रूप से गेहूं और बाजरे जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं। मौसम, कीट या बाजार की गिरावट के कारण यदि ये फसलें प्रभावित होती हैं, तो किसान भारी आर्थिक नुकसान झेलते हैं। फसल विविधीकरण से यह जोखिम कम हो जाता है और किसानों की वित्तीय सुरक्षा मजबूत होती है।

साथ ही, विविध फसलों की खेती से किसानों की आय में वृद्धि होती है। सब्जियां, मसाले और तिलहन जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पाद बाजार में अच्छी कीमत पा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान समय पर बीज, उर्वरक और तकनीकी सहायता प्राप्त करें, तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार संभव है।

राजस्थान में कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विशेषज्ञ किसानों को फसल विविधीकरण पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रहे हैं। इसके तहत किसान सीख सकते हैं कि कौन-कौन सी फसलें उनके क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं, उनके लिए सिंचाई और उर्वरक का प्रबंधन कैसे किया जाए और किस प्रकार बाज़ार में उत्पाद बेचकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

किसानों का कहना है कि परंपरागत फसलों के अलावा नई फसलों की खेती करने से उनकी आय बढ़ सकती है और मौसम और कीट से होने वाले नुकसान से बचाव भी संभव है। सरकार भी किसानों को सब्सिडी और तकनीकी मदद देकर फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि फसल विविधीकरण केवल आय बढ़ाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह खेत की मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, पानी की बचत और कृषि प्रणाली को स्थायी बनाने का भी तरीका है। विविध फसलें मिट्टी में विभिन्न पोषक तत्वों को संतुलित करती हैं और लंबे समय में कृषि उत्पादन को बढ़ाती हैं।

अंततः, राजस्थान में फसल विविधीकरण को अपनाना किसानों के लिए सुरक्षा और लाभ दोनों का साधन बन सकता है। इससे खेती का जोखिम घटेगा, आय बढ़ेगी और राज्य का कृषि क्षेत्र और अधिक स्थिर और मजबूत बनेगा।