बूंदी में रामकथा में शिक्षकों की ड्यूटी पर विवाद, विरोध के बाद सरकार ने आदेश लिया वापस
राजस्थान के बूंदी जिले के बांसी कस्बे स्थित अंबिका माता मंदिर में आयोजित रामकथा के दौरान सरकारी शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। धार्मिक आयोजन में शिक्षकों को व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी सौंपे जाने से शिक्षा विभाग और प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए। शिक्षक संगठनों के कड़े विरोध और राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद आखिरकार प्रशासन को यह आदेश वापस लेना पड़ा।
जानकारी के मुताबिक, बांसी के अंबिका माता मंदिर में नौ दिवसीय रामकथा का आयोजन 30 जनवरी से शुरू हुआ है, जो 7 फरवरी तक चलेगा। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने के लिए सरकारी स्कूलों के पांच शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी। इन शिक्षकों को भीड़ नियंत्रण, व्यवस्था संचालन और अन्य प्रबंधन संबंधी जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।
जैसे ही यह आदेश सामने आया, शिक्षक समुदाय में नाराजगी फैल गई। शिक्षकों का कहना था कि उनका प्राथमिक कर्तव्य स्कूलों में पढ़ाई कराना है, न कि धार्मिक आयोजनों में व्यवस्थाएं संभालना। उनका तर्क था कि इससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है और शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ता है। कई शिक्षक संगठनों ने इसे शिक्षकों का “दुरुपयोग” बताते हुए आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की।
मामला बढ़ता देख विभिन्न शिक्षक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपकर प्रशासन पर दबाव बनाया। उनका कहना था कि पहले से ही सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, ऐसे में शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस मामले को विधानसभा में उठाते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को पढ़ाने के बजाय धार्मिक आयोजनों में तैनात करना पूरी तरह अनुचित है और इससे शिक्षा व्यवस्था कमजोर होती है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट नीति बनाने और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखने की मांग की।
विवाद बढ़ने और चौतरफा आलोचना के बाद प्रशासन ने बुधवार को अपना आदेश वापस ले लिया। शिक्षकों को रामकथा की ड्यूटी से मुक्त कर दिया गया, जिससे शिक्षक समुदाय ने राहत की सांस ली। प्रशासन की ओर से अब वैकल्पिक व्यवस्थाएं करने की बात कही गई है।
फिलहाल यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्यों तक सीमित रखना ही छात्रों और शिक्षा प्रणाली के हित में है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था प्रशासन को अन्य संसाधनों से करनी चाहिए, न कि स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित करके।
आदेश वापस होने के बाद भले ही विवाद थम गया हो, लेकिन इस घटना ने सरकारी व्यवस्थाओं और प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।