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पश्चिमी राजस्थान में पर्यावरण बचाने की जंग: खेजड़ी कटाई रोकने को जन आंदोलन तेज

 

पश्चिमी राजस्थान में विकास के नाम पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर चल रहा जन आंदोलन इन दिनों सुर्खियों में है। राज्य में सोलर ऊर्जा के तेजी से विस्तार के बीच खेजड़ी के पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव सामने आया है, जिसे रोकने के लिए स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी एकजुट हो गए हैं। यह संघर्ष न केवल पेड़ों की रक्षा का मामला है, बल्कि सामाजिक और पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण का प्रतीक भी बन गया है।

खेजड़ी, जो राजस्थान का राज्य वृक्ष भी है, पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सूखे क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखता है, जल संरक्षण में मदद करता है और जैव विविधता को संरक्षित करता है। पश्चिमी राजस्थान में बिश्नोई समुदाय सदियों से खेजड़ी के पेड़ों की पूजा और संरक्षण करता आया है। उनकी परंपरा के अनुसार, खेजड़ी की रक्षा करना केवल पर्यावरणीय कर्तव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी है।

हाल ही में सोलर प्लांट्स के लिए खेजड़ी के पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव आया, जिससे यह पारंपरिक और सामाजिक मूल्य सीधे खतरे में पड़ गए। इसके विरोध में बिश्नोई समुदाय ने आंदोलन तेज कर दिया है। उनका कहना है कि सौर ऊर्जा के विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए प्राकृतिक और पारंपरिक संसाधनों की बेजा क्षति कतई नहीं होनी चाहिए।

इस आंदोलन में अब केवल बिश्नोई समुदाय ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और पड़ोसी राज्यों के पर्यावरण प्रेमी भी शामिल हो रहे हैं। विभिन्न एनजीओ, छात्र संगठन और समाजसेवी समूह इस आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। लोग चेतावनी दे रहे हैं कि यदि खेजड़ी की कटाई हुई, तो यह न केवल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बनेगा, बल्कि स्थानीय जीवन और कृषि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान जैसे अर्धशुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों में खेजड़ी जैसी प्रजातियों की रक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पेड़ न केवल जैव विविधता बनाए रखने में सहायक है, बल्कि स्थानीय जल स्रोतों और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बिना क्षेत्र में पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ सकता है और जल संकट और रेगिस्तानीकरण की समस्या और गंभीर हो सकती है।

राज्य सरकार और संबंधित विभागों के लिए यह आंदोलन एक चेतावनी भी है। सौर ऊर्जा जैसे विकासात्मक परियोजनाओं को लागू करते समय प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक समुदायों के अधिकारों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय जन सहभागिता और सामाजिक चेतना अब विकास परियोजनाओं की योजना और कार्यान्वयन में निर्णायक भूमिका निभा रही है।

पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी बचाने का यह संघर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल पेड़ों की रक्षा नहीं करता, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक प्रतिबद्धता और आधुनिक विकास के बीच संतुलन की लड़ाई भी है। जैसे-जैसे आंदोलन व्यापक हो रहा है, यह पूरे राज्य और देश के पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है।

इस तरह, पश्चिमी राजस्थान का यह जन आंदोलन पर्यावरणीय जागरूकता, सामाजिक एकजुटता और सतत विकास के सिद्धांतों को सामने लाने में अहम भूमिका निभा रहा है। खेजड़ी के पेड़ों की सुरक्षा के लिए उठाया गया यह कदम दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय और पर्यावरण प्रेमी मिलकर बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की दिशा में प्रभावशाली पहल कर सकते हैं।