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जयपुर में JDA अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी, वीडियो में जाने 12 अक्टूबर को पेश करने के आदेश

 

जिला उपभोक्ता आयोग-2 ने भूखंड का कब्जा नहीं देने के मामले में जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के जेडीसी और जोन उपायुक्त-9 के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। आयोग ने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिए हैं कि दोनों अधिकारियों को 12 अक्टूबर को आयोग के समक्ष पेश किया जाए। यह आदेश कृष्णा की ओर से दायर अवमानना प्रार्थना पत्र पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

लॉटरी में भूखंड मिलने के बाद भी नहीं मिला कब्जा

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प्रार्थना पत्र के अनुसार, कृष्णा ने जेडीए की निलय कुंज आवास योजना में भूखंड के लिए आवेदन किया था। योजना की लॉटरी में उन्हें भूखंड आवंटित भी हो गया, लेकिन निर्धारित समय बीतने के बावजूद जेडीए की ओर से भूखंड का कब्जा नहीं दिया गया। इसके बाद परिवादी ने वर्ष 2012 में जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।

2016 में परिवादी के पक्ष में आया था फैसला

मामले की सुनवाई के बाद जिला उपभोक्ता आयोग ने वर्ष 2016 में परिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया था। आयोग ने जेडीए को निर्देश दिए थे कि परिवादी को आवंटित भूखंड का कब्जा पत्र जारी किया जाए। हालांकि, जेडीए ने इस आदेश को चुनौती देते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की।प्रार्थना पत्र में बताया गया कि दोनों आयोगों में अपील के बावजूद जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश बरकरार रहा। इसके बाद भी परिवादी को भूखंड का कब्जा नहीं मिला। लंबे समय तक आदेश की पालना नहीं होने पर कृष्णा ने जिला उपभोक्ता आयोग-2 में अवमानना प्रार्थना पत्र पेश किया।

अवमानना मामले में आयोग की सख्ती

अवमानना प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग-2 ने जेडीसी और जोन उपायुक्त-9 के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने के आदेश दिए। साथ ही पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि दोनों अधिकारियों को 12 अक्टूबर को आयोग के सामने पेश किया जाए।इस कार्रवाई से उपभोक्ता आयोग के आदेशों की पालना नहीं होने के मामले में जेडीए की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मामले में अब 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई अहम मानी जा रही है। आयोग के समक्ष अधिकारियों की पेशी के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी।यह मामला इस बात को भी रेखांकित करता है कि उपभोक्ता विवादों में फैसला आने के बाद उसकी समय पर पालना करना संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। लंबे समय तक आदेश लागू नहीं होने से उपभोक्ताओं को न्याय पाने के लिए दोबारा कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ सकता है।