नागपुर और पुणे में कांग्रेस-NCP की जीत से BJP को झटका, टिकट बंटवारे और महायुति की खींचतान बनी चुनौती
महाराष्ट्र के नागपुर और पुणे में हुए चुनावी मुकाबलों में विपक्षी दलों को मिली जीत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और महायुति गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। नागपुर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज की, जबकि पुणे में शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-SP) की हर्षदा देशमुख विजयी रहीं। इन नतीजों को केवल दो सीटों की जीत-हार के रूप में नहीं, बल्कि टिकट वितरण, पार्टी के भीतर नाराजगी और गठबंधन के आपसी तालमेल के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
नागपुर में टिकट को लेकर असंतोष
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने BJP के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया। यह सीट BJP का पुराना गढ़ मानी जाती रही है। पार्टी करीब छह दशक तक इस सीट पर मजबूत स्थिति में रही थी, लेकिन 2020 में वंजारी ने जीत दर्ज कर समीकरण बदल दिए थे। इस बार भी कांग्रेस ने सीट बरकरार रखी।
BJP की हार के पीछे टिकट चयन को एक प्रमुख वजह माना जा रहा है। पार्टी ने पूर्व MLC अनिल सोले की जगह सुधाकर कोहले को उम्मीदवार बनाया था। टिकट नहीं मिलने से नाराज सोले ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। बाद में उन्होंने देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात के बाद कोहले को समर्थन देने की बात कही, लेकिन तब तक नामांकन वापसी की तारीख निकल चुकी थी। इसके अलावा पार्टी के कुछ अन्य नेताओं की नाराजगी की भी चर्चा रही।
निर्दलीय उम्मीदवार नीतेश कराले को मिले वोटों ने भी मुकाबले को प्रभावित किया। BJP उम्मीदवार कोहले ने चुनावी नतीजे के बाद दावा किया कि निर्दलीय उम्मीदवार की वजह से पार्टी के वोट बंटे। हालांकि, यह उनका राजनीतिक आकलन है।
पुणे में उम्मीदवार चयन पर उठे सवाल
पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में शरद पवार की NCP (SP) की हर्षदा देशमुख-जाधव ने BJP की स्मिता जाधव को हराकर जीत हासिल की। इस सीट पर BJP ने स्मिता जाधव को टिकट दिया था, जबकि पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष की खबरें सामने आईं।
पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठा कि पुणे जैसे क्षेत्र में, जहां BJP का मजबूत संगठन और कार्यकर्ता आधार है, वहां किसी स्थानीय नेता को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, टिकट वितरण को लेकर असंतोष और कार्यकर्ताओं की अपेक्षित सक्रियता नहीं होना BJP के लिए नुकसानदेह रहा।
महायुति में तालमेल की कमी भी बनी चुनौती
इन चुनावों में BJP के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन के भीतर मतभेद भी सामने आए। BJP के प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने पुणे और नागपुर में गठबंधन के उम्मीदवारों को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। उन्होंने पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सानप को शिवसेना की ओर से समर्थन दिए जाने पर भी सवाल उठाए।
वहीं, शिवसेना नेताओं ने भी गठबंधन में सहयोग और समन्वय की कमी पर सवाल उठाए। शिवसेना के नेताओं का कहना था कि गठबंधन के सहयोगियों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इन आरोप-प्रत्यारोप से साफ हुआ कि स्थानीय स्तर पर सीटों और उम्मीदवारों को लेकर सहयोगी दलों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी।
नतीजों ने BJP को आत्ममंथन का मौका दिया
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के चुनाव में महाविकास अघाड़ी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि महायुति को दो सीटों पर जीत मिली। BJP ने पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज की, जबकि शिवसेना ने अमरावती शिक्षक सीट अपने नाम की। दूसरी ओर, NCP (SP) ने पुणे और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीटों पर जीत हासिल की।
इन नतीजों ने BJP के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पार्टी को अब उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन की सक्रियता, नाराज नेताओं को साथ रखने और गठबंधन सहयोगियों के साथ बेहतर तालमेल बनाने पर विचार करना होगा। हालांकि, ये चुनाव स्नातक और शिक्षक मतदाताओं के सीमित समूह के बीच हुए थे, इसलिए इनके नतीजों को पूरे महाराष्ट्र के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का सीधा संकेत नहीं माना जा सकता।