नागपुर में कांग्रेस और पुणे में शरद पवार की NCP ने दर्ज की जीत, BJP को लगा झटका
महाराष्ट्र के नागपुर और पुणे में हुए चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। नागपुर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी और पुणे में शरद पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की हर्षदा देशमुख ने जीत दर्ज की। इन नतीजों के बाद टिकट वितरण, पार्टी के भीतर नाराजगी और महायुति गठबंधन के घटक दलों के बीच मतभेदों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के लिए हुए चुनाव में महाविकास आघाड़ी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि सत्तारूढ़ महायुति को दो सीटों पर सफलता मिली। भाजपा ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे सिर्फ पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत मिली। नागपुर और पुणे स्नातक सीटों पर मिली हार ने पार्टी के टिकट चयन और संगठनात्मक रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नागपुर में दूसरी वरीयता के वोटों ने बदला नतीजा
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया। वंजारी को 67,231 वोट मिले, जबकि कोहले को 63,960 वोट प्राप्त हुए। मतगणना करीब 40 घंटे से अधिक समय तक चली।
शुरुआती गिनती में भाजपा उम्मीदवार आगे थे, लेकिन पहली वरीयता के मतों से जीत का जरूरी कोटा पूरा नहीं हुआ। इसके बाद दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती हुई। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को मिले 24,249 वोट और उनके मतों के हस्तांतरण ने मुकाबले को प्रभावित किया। अंततः वंजारी ने जीत दर्ज की।
पुणे में टिकट चयन पर उठे सवाल
पुणे स्नातक सीट पर शरद पवार की NCP (SP) की हर्षदा देशमुख-जाधव ने भाजपा उम्मीदवार स्मिता जाधव को हराया। इस सीट पर भाजपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष की खबरें सामने आईं। पार्टी के भीतर सवाल उठे कि मजबूत संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बावजूद किसी स्थानीय चेहरे को उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया।
राजनीतिक विश्लेषण में इसे भाजपा के लिए स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ और संगठनात्मक संपर्क की समीक्षा करने का संकेत माना जा रहा है।
महायुति में सहयोग को लेकर भी विवाद
चुनाव के बाद महायुति के सहयोगी दलों के बीच तालमेल को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। भाजपा के महाराष्ट्र प्रवक्ता नवनाथ बन ने शिवसेना (शिंदे गुट) पर गठबंधन धर्म का पालन नहीं करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल होता तो महायुति पांचों सीटें जीत सकती थी।
पुणे शिक्षक सीट पर भाजपा ने कौस्तुभ गावड़े को उम्मीदवार बनाया था। वहीं, शिवसेना से जुड़े नेताओं की ओर से निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सानप को समर्थन मिलने की बात सामने आई। हालांकि, इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। इसके बावजूद सहयोगी दलों के बीच समर्थन और चुनावी रणनीति को लेकर विवाद सामने आया। शिवसेना नेताओं ने भी भाजपा पर सहयोगियों को हल्के में लेने का आरोप लगाया।
युवाओं और स्नातकों की नाराजगी भी चर्चा में
नागपुर और पुणे की हार के बाद राज्य में भर्ती परीक्षाओं, NEET और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) से जुड़े मुद्दों पर युवाओं की नाराजगी भी चर्चा में है। इन मुद्दों को लेकर हाल के महीनों में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं। चुनावी नतीजों के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन वर्गों की चिंताओं का असर मतदान पर पड़ा।
हालांकि, चुनाव परिणामों को किसी एक वजह से जोड़ना सही नहीं होगा। टिकट वितरण, निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका, वरीयता आधारित मतदान और गठबंधन के भीतर तालमेल जैसे कई पहलू इन नतीजों से जुड़े रहे।
कुल मिलाकर, महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के नतीजों ने भाजपा और महायुति के सामने संगठन तथा सहयोगी दलों के साथ समन्वय की चुनौती रखी है