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शिवसेना की दशहरा रैली के 60 साल, आज 2 अलग-अलग आयोजन; बाल ठाकरे की विरासत की लड़ाई
 

 

शिवसेना की पहली दशहरा रैली की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर, इस मंगलवार को मुंबई में दो अलग-अलग रैलियों का आयोजन किया गया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट दादर के शिवाजी पार्क में इकट्ठा हुआ है, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट गोरेगांव के नेस्को (NESCO) ग्राउंड में अपनी रैली कर रहा है। दोनों ही गुट बाल ठाकरे की विरासत पर अपना दावा जता रहे हैं। कभी एकजुट शिवसेना की ताकत के प्रदर्शन के रूप में देखी जाने वाली यह रैली, अब पार्टी की पहचान, राजनीतिक प्रभाव और भविष्य को लेकर चल रही लड़ाई का केंद्र बन गई है। दोनों गुटों के सामने अपने समर्थकों को एकजुट रखने और महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी ताकत साबित करने की चुनौती है।

शिवसेना की दशहरा रैली की परंपरा 30 अक्टूबर 1966 को शुरू हुई थी। शिवसेना की स्थापना के लगभग चार महीने बाद, बाल ठाकरे ने शिवाजी पार्क में पहली रैली आयोजित की थी। उस समय, वे मुख्य रूप से एक कार्टूनिस्ट और मराठी साप्ताहिक पत्रिका 'मार्मिक' के संपादक के रूप में जाने जाते थे। हालांकि उन्हें पहली रैली के लिए कोई छोटी जगह चुनने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने शिवाजी पार्क में ही रैली करने पर जोर दिया। इस कार्यक्रम में भारी भीड़ उमड़ी थी, और चंदा इकट्ठा करने के लिए एक स्टील का डिब्बा भी घुमाया गया था। इस घटना ने मुंबई में मराठी भाषी लोगों के अधिकारों की मांग को एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदलने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद, दशहरा रैली शिवसेना की पहचान का पर्याय बन गई। हर साल, बाल ठाकरे इसी मंच से पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते थे और महाराष्ट्र की राजनीति पर अपने विचार रखते थे। 2012 में उनके निधन के बाद, उद्धव ठाकरे ने 2013 से इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

'असली' शिवसेना के लिए लड़ाई
2022 में शिवसेना में एक बड़ा बदलाव आया, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह के कारण उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई। इसके बाद पार्टी दो गुटों में बंट गई और दोनों पक्षों ने पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर अपना दावा पेश किया। अंततः चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी। उद्धव के नेतृत्व वाले गुट के लिए, शिवाजी पार्क के साथ जुड़ाव उसकी राजनीतिक पहचान को बनाए रखने का एक अहम आधार रहा है। 2022 में, दोनों गुटों ने एक ही जगह पर अपनी-अपनी रैलियां करने की कोशिश की, जिसे लेकर विवाद हुआ और मामला अदालत तक पहुंच गया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उद्धव गुट को शिवाजी पार्क में रैली करने की अनुमति दी, जबकि शिंदे गुट को अपना कार्यक्रम बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स के MMRDA मैदान में करना पड़ा। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में, शिंदे गुट ने 57 सीटें जीतीं, जबकि शिवसेना (UBT) को 20 सीटें मिलीं। शिंदे महाराष्ट्र की 'महायुति' सरकार में उपमुख्यमंत्री भी हैं; इससे उनके गुट को संगठन और सरकार, दोनों ही स्तरों पर एक खास फायदा मिला है।


इस साल, दोनों गुटों ने अपनी-अपनी रैलियों के लिए अलग-अलग विषय (थीम) चुने हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट संविधान की रक्षा करने और चुनावों में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध जताने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। दूसरी ओर, शिंदे गुट ने अपनी रैली को सूखे से प्रभावित किसानों और उनके परिवारों को समर्पित किया है। उन्होंने ग्रामीण परिवारों के लिए राशन किट बांटने और आर्थिक सहायता देने जैसी पहल की घोषणा की है। उद्धव के सामने अपने पारंपरिक समर्थक आधार को बचाए रखने की चुनौती है—इस कोशिश में, वे बाल ठाकरे की विरासत और शिवाजी पार्क के साथ जुड़े भावनात्मक लगाव का सहारा ले रहे हैं, ताकि अपना खोया हुआ राजनीतिक प्रभाव फिर से हासिल कर सकें। वहीं दूसरी ओर, शिंदे को यह साबित करना होगा कि चुनाव आयोग द्वारा उनके गुट को मिली मान्यता, विधानसभा की अधिक सीटें और सरकार में उनकी भागीदारी ने शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों के बीच उनकी स्थिति को मजबूत किया है।