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महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के बढ़े मामले, 5 महीनों में 313 किसानों ने दी जान; सबसे ज्यादा प्रभावित यवतमाल

 

महाराष्ट्र के पश्चिम विदर्भ क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या के मामलों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। जनवरी से मई 2026 के बीच इस क्षेत्र में 313 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सबसे अधिक 105 मामले यवतमाल जिले में सामने आए हैं, जो लंबे समय से किसान संकट का केंद्र माना जाता रहा है।

जारी आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या से प्रभावित परिवारों में से अब तक केवल 76 परिवारों को सरकारी सहायता के लिए पात्र माना गया है। वहीं 181 मामलों की जांच और पात्रता निर्धारण की प्रक्रिया अभी भी लंबित है। इससे प्रभावित परिवारों को राहत मिलने में देरी हो रही है, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक परेशानियां और बढ़ सकती हैं।

पश्चिम विदर्भ के अन्य जिलों में भी किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता, फसल को उचित दाम न मिलना और कर्ज का बोझ किसानों की मुश्किलों को लगातार बढ़ा रहा है। हालांकि, प्रत्येक आत्महत्या के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं और प्रशासन जांच के बाद ही कारणों का आधिकारिक निर्धारण करता है।

सरकारी नियमों के तहत किसान आत्महत्या के प्रत्येक मामले की जांच की जाती है। जांच समिति यह तय करती है कि संबंधित परिवार सरकारी मुआवजे और अन्य सहायता योजनाओं के लिए पात्र है या नहीं। इसी प्रक्रिया के चलते कई मामलों का निपटारा होने में समय लग जाता है।

किसान संगठनों ने लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे और पात्र परिवारों को जल्द आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि संकटग्रस्त परिवारों को समय पर राहत मिलना बेहद जरूरी है, ताकि वे आर्थिक तंगी से उबर सकें।

वहीं, राज्य सरकार का कहना है कि सभी मामलों की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच की जा रही है। पात्र पाए जाने वाले परिवारों को नियमानुसार सहायता प्रदान की जाएगी। प्रशासन ने लंबित मामलों का जल्द से जल्द निस्तारण करने का भी भरोसा दिलाया है।

पश्चिम विदर्भ में लगातार सामने आ रहे किसान आत्महत्या के मामले कृषि क्षेत्र की चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों की आय बढ़ाने, जोखिम कम करने और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक एवं प्रभावी नीतियों की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को कम किया जा सके।