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117 वर्षों से लंदन के म्यूजियम में विराजमान वाग्देवी की प्रतिमा, भारत से इंग्लैंड तक कैसे पहुंची यह ऐतिहासिक धरोहर?

 

भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी वाग्देवी (मां सरस्वती) की एक दुर्लभ प्रतिमा पिछले 117 वर्षों से लंदन के विश्वप्रसिद्ध ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित है। यह प्रतिमा भारत में हुई खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी, लेकिन औपनिवेशिक काल के दौरान यह इंग्लैंड कैसे पहुंची—यह सवाल आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

इतिहास के अनुसार, यह प्रतिमा भारतीय उपमहाद्वीप में किसी प्राचीन स्थल की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और पुरातात्विक खोजों पर ब्रिटिश अधिकारियों और संग्रहकर्ताओं का व्यापक नियंत्रण था। माना जाता है कि उस दौर में कई महत्वपूर्ण मूर्तियां और कलाकृतियां या तो औपचारिक रूप से संग्रहालयों को सौंप दी गईं या फिर औपनिवेशिक संग्रह नीति के तहत विदेश ले जाई गईं।

वाग्देवी की यह प्रतिमा भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय पुरातात्विक वस्तुओं के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के नाम पर बड़ी संख्या में कलाकृतियों को ब्रिटेन भेजा गया था, जहां उन्हें संग्रहालयों में प्रदर्शित किया गया। ब्रिटिश म्यूजियम में आज भी यह प्रतिमा भारतीय कला और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।

भारतीय कला इतिहासकारों के अनुसार, वाग्देवी की यह मूर्ति केवल एक धार्मिक प्रतिमा नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारत की शिक्षा, ज्ञान और संस्कृति का प्रतीक भी है। इसमें बारीक नक्काशी और पारंपरिक मूर्तिकला शैली उस समय की उच्च कलात्मक दक्षता को दर्शाती है।

हालांकि, इस प्रतिमा के इंग्लैंड पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट और विस्तृत आधिकारिक दस्तावेज सीमित हैं। यही कारण है कि इसके हस्तांतरण को लेकर अलग-अलग मत और दावे सामने आते रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे औपनिवेशिक संग्रह का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ इसे उस समय की कानूनी पुरातात्विक गतिविधियों से जुड़ा बताते हैं।

आज के समय में इस तरह की प्राचीन भारतीय धरोहरों की वापसी (repatriation) को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है। भारत सहित कई देश अपने-अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को वापस लाने की मांग करते रहे हैं, जो औपनिवेशिक काल में विदेश ले जाई गई थीं।

वहीं, लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम का कहना है कि उनके पास मौजूद संग्रह विश्व इतिहास की साझा विरासत का हिस्सा है और इन्हें अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए संरक्षित रखा गया है। इस विषय पर समय-समय पर भारत और ब्रिटेन के बीच सांस्कृतिक सहयोग और संवाद भी होता रहा है।

वाग्देवी की यह प्रतिमा न केवल एक कलात्मक धरोहर है, बल्कि यह भारत के समृद्ध इतिहास और उसकी बौद्धिक परंपरा की भी याद दिलाती है। 117 वर्षों से विदेशी धरती पर मौजूद यह मूर्ति आज भी लोगों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या ऐतिहासिक धरोहरें अपने मूल स्थान पर वापस लौटनी चाहिए या उन्हें वैश्विक संग्रहालयों में ही संरक्षित रखा जाना चाहिए।