सुप्रीम कोर्ट ने नई जेंडर गाइडबुक को दी मंजूरी, जस्टिस बोस के नेतृत्व में तैयार हुआ ड्राफ्ट; न्यायपालिका के लिए बनेगी मार्गदर्शिका
सुप्रीम कोर्ट ने जेंडर से जुड़े मामलों में संवेदनशील और समान दृष्टिकोण अपनाने के लिए तैयार की गई नई जेंडर गाइडबुक को मंजूरी दे दी है। इस गाइडबुक का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में लैंगिक भेदभाव को कम करना और महिलाओं, पुरुषों तथा अन्य जेंडर पहचानों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान उचित भाषा और दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है।
इस गाइडबुक का ड्राफ्ट भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) के डायरेक्टर जस्टिस अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में तैयार किया गया है। इसमें न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के लिए ऐसे शब्दों और दृष्टिकोणों को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए हैं, जिनसे अदालतों में जेंडर संबंधी मामलों को अधिक संवेदनशीलता के साथ समझा और निपटाया जा सके।
न्यायिक भाषा में बदलाव पर जोर
नई गाइडबुक में न्यायिक फैसलों और अदालती कार्यवाही के दौरान इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर विशेष ध्यान दिया गया है। इसमें ऐसे शब्दों और टिप्पणियों से बचने की सलाह दी गई है, जो किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान, व्यवहार या सामाजिक भूमिका को लेकर पूर्वाग्रह को बढ़ावा दे सकते हैं।
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अदालतों में हर व्यक्ति के साथ सम्मानजनक और समान व्यवहार हो। गाइडबुक न्यायाधीशों को यह समझने में मदद करेगी कि जेंडर से जुड़े मुद्दों को केवल सामाजिक रूढ़ियों के आधार पर नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के नजरिए से देखा जाए।
जेंडर स्टीरियोटाइप खत्म करने की पहल
सुप्रीम कोर्ट पहले भी न्यायिक फैसलों में इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर कई बार चिंता जता चुका है। अदालत का मानना रहा है कि कानून की भाषा समाज में सोच को प्रभावित करती है। ऐसे में न्यायिक फैसलों में किसी भी तरह के जेंडर स्टीरियोटाइप से बचना जरूरी है।
नई गाइडबुक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसमें पुराने और भेदभावपूर्ण शब्दों की जगह अधिक तटस्थ और संवेदनशील शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।
न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण में होगी मदद
नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी देशभर के न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम करती है। नई गाइडबुक का इस्तेमाल न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी किया जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल अदालतों में जेंडर संवेदनशीलता बढ़ाने के साथ-साथ पीड़ितों और पक्षकारों के प्रति न्याय व्यवस्था में भरोसा मजबूत करने में मदद करेगी।
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद अब यह गाइडबुक न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संदर्भ दस्तावेज के रूप में काम करेगी और जेंडर से जुड़े मामलों की सुनवाई के तरीके में सकारात्मक बदलाव लाने की उम्मीद है।