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6 लाख रुपए खर्च कर स्कूल की पहली मंजिल पर बना दिए कमरे, 14 साल से बल्लियों के सहारे टिकी छत; ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां तक नहीं

 

सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए सरकार लाखों रुपए खर्च करती है, लेकिन कई बार निर्माण कार्यों में ऐसी लापरवाही सामने आती है, जो व्यवस्था पर सवाल खड़े कर देती है। एक स्कूल में करीब 6 लाख रुपए खर्च कर पहली मंजिल पर कमरे तो बना दिए गए, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण ही नहीं कराया गया। पिछले 14 साल से ये कमरे बिना उपयोग के पड़े हैं। वहीं, स्कूल की छत को बल्लियों के सहारे टिकाया गया है।

स्कूल की इस स्थिति से न केवल सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। पहली मंजिल पर बने कमरों का इस्तेमाल नहीं हो पाने के कारण सरकारी धन का अपेक्षित लाभ भी नहीं मिल रहा है।

6 लाख रुपए खर्च, लेकिन सीढ़ियां बनाना भूल गए जिम्मेदार

स्कूल की पहली मंजिल पर अतिरिक्त कमरों के निर्माण के लिए करीब 6 लाख रुपए खर्च किए गए थे। निर्माण के दौरान कमरों का ढांचा तो तैयार कर दिया गया, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां नहीं बनाई गईं। ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थी इन कमरों तक पहुंच ही नहीं सकते।

करीब 14 साल बीत जाने के बाद भी यह समस्या जस की तस बनी हुई है। पहली मंजिल पर बने कमरे इस्तेमाल में नहीं आ सके। अगर शुरुआत में ही निर्माण योजना में सीढ़ियों की व्यवस्था शामिल की जाती, तो इन कमरों का उपयोग पढ़ाई और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

बल्लियों के सहारे टिकी स्कूल की छत

स्कूल की इमारत की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। यहां छत को बल्लियों के सहारे टिकाया गया है। यह स्थिति भवन की सुरक्षा और रखरखाव को लेकर सवाल खड़े करती है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे में भवन की तकनीकी जांच और मरम्मत की जरूरत महसूस की जा रही है।

छत को सहारा देने के लिए बल्लियों का इस्तेमाल लंबे समय तक किया जाना उचित व्यवस्था नहीं माना जा सकता। यदि भवन की संरचना कमजोर है, तो किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए समय रहते जरूरी कदम उठाना आवश्यक है।

सरकारी धन खर्च होने के बाद भी नहीं मिला फायदा

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्माण के समय जिम्मेदार अधिकारियों ने सीढ़ियों की व्यवस्था पर ध्यान क्यों नहीं दिया। करीब 6 लाख रुपए खर्च होने के बावजूद पहली मंजिल के कमरे 14 साल से बेकार पड़े हैं। इससे सरकारी बजट के उपयोग और निर्माण कार्यों की निगरानी पर सवाल उठते हैं।

स्कूल भवन का निर्माण केवल कमरे तैयार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसमें विद्यार्थियों की आवाजाही, सुरक्षा और उपयोगिता का भी ध्यान रखना जरूरी है। यदि किसी इमारत में कमरे तो बना दिए जाएं, लेकिन वहां पहुंचने का रास्ता ही न हो, तो निर्माण का उद्देश्य पूरा नहीं होता।

जांच और मरम्मत की जरूरत

स्कूल की मौजूदा स्थिति को देखते हुए भवन की तकनीकी जांच कराना जरूरी है। पहली मंजिल पर जाने के लिए सुरक्षित सीढ़ियों का निर्माण और छत की स्थिति का परीक्षण प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांच की जानी चाहिए कि निर्माण के समय स्वीकृत नक्शे और बजट में क्या प्रावधान थे तथा काम किसकी निगरानी में कराया गया था।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी में स्कूल का नाम, गांव और जिले का उल्लेख नहीं है। इसलिए संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया और कार्रवाई के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।