ग्वालियर स्मार्ट सिटी के कई प्रोजेक्ट बदहाल, नए प्रस्तावों में व्यस्त अफसर; करोड़ों की परियोजनाएं हो रहीं कबाड़
ग्वालियर स्मार्ट सिटी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (GSCDCL) की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि निगम के अधिकारी केंद्र सरकार से मिलने वाली राशि को नए-नए प्रोजेक्ट्स में खर्च करने की योजना बनाने में तो लगातार जुटे हैं, लेकिन पहले से तैयार हो चुके स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के रखरखाव और संचालन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। इसका नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार कई परियोजनाएं अब बदहाली का शिकार होकर कबाड़ जैसी स्थिति में पहुंच गई हैं।
स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना और नागरिकों को बेहतर बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना था। इसके तहत ग्वालियर में भी कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शुरू की गईं। इनमें सार्वजनिक सुविधाओं का विकास, स्मार्ट सड़कें, आधुनिक सार्वजनिक स्थल, डिजिटल सुविधाएं और शहरी सौंदर्यीकरण जैसे कई कार्य शामिल थे। लेकिन अब इनमें से कई प्रोजेक्ट उचित देखरेख के अभाव में अपनी चमक खो चुके हैं।
शहर के विभिन्न हिस्सों में बनाए गए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स पर नजर डालें तो कई स्थानों पर उपकरण खराब पड़े हैं, सार्वजनिक सुविधाएं बंद हैं, डिजिटल सिस्टम काम नहीं कर रहे और कई जगहों पर संरचनाएं जर्जर होती नजर आ रही हैं। रखरखाव के अभाव में करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियां धीरे-धीरे अनुपयोगी होती जा रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि परियोजनाओं के उद्घाटन के समय बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन समय बीतने के साथ उनका रखरखाव पूरी तरह उपेक्षित हो गया। उनका आरोप है कि अधिकारी नई योजनाओं की घोषणा और प्रस्ताव तैयार करने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं, जबकि पहले से बनी सुविधाओं को बचाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्मार्ट सिटी परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि नियमित संचालन और रखरखाव पर निर्भर करती है। यदि तैयार परिसंपत्तियों का समय पर रखरखाव नहीं किया जाए तो करोड़ों रुपये का निवेश बेकार हो सकता है और जनता को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
शहरी विकास से जुड़े जानकारों का कहना है कि नई परियोजनाओं को मंजूरी देने के साथ-साथ पुरानी परियोजनाओं का ऑडिट, रखरखाव और उपयोगिता का नियमित मूल्यांकन भी जरूरी है। इससे न केवल सरकारी धन का बेहतर उपयोग होगा बल्कि नागरिकों को भी स्मार्ट सिटी मिशन का वास्तविक लाभ मिल सकेगा।
फिलहाल शहर में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब पहले से तैयार परियोजनाएं ही बदहाल हो रही हैं, तो नई योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करने का औचित्य क्या है। अब नागरिकों की नजर प्रशासन पर है कि वह स्मार्ट सिटी के जर्जर हो चुके प्रोजेक्ट्स को दोबारा व्यवस्थित करने और उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।