स्मार्ट सिटी के नाम पर 72 करोड़ खर्च, फिर भी सुविधाएं अधूरी; न 24 घंटे पानी मिला, न अच्छी सड़क
स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत शहर को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर नागरिकों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। शहर में स्मार्ट सिटी के नाम पर करीब 72 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद न तो लोगों को 24 घंटे पानी की सुविधा मिल सकी और न ही सड़कों की स्थिति में अपेक्षित सुधार हुआ।
दूसरी ओर, नगर निकाय की ओर से नागरिकों से विभिन्न सेवाओं के नाम पर शुल्क वसूला जा रहा है। ऐसे में लोगों का सवाल है कि जब उनसे सुविधाओं के लिए शुल्क लिया जा रहा है और स्मार्ट सिटी परियोजना पर भी करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, तो उन्हें बुनियादी सुविधाएं बेहतर तरीके से क्यों नहीं मिल रही हैं।
72 करोड़ खर्च होने के बाद भी सवाल
स्मार्ट सिटी परियोजना का उद्देश्य शहर की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना और नागरिकों को बेहतर जीवन सुविधाएं उपलब्ध कराना था। इसके तहत पानी, सड़क, यातायात, साफ-सफाई और अन्य शहरी सेवाओं को आधुनिक बनाने पर जोर दिया गया।
हालांकि, करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी कई इलाकों में लोगों की शिकायतें बनी हुई हैं। लोगों का कहना है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी समस्याओं का समाधान पूरी तरह नहीं हो सका।
सबसे बड़ी शिकायत पानी की आपूर्ति को लेकर है। शहर में अब भी लोगों को 24 घंटे पानी उपलब्ध नहीं हो रहा है। कई क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति निर्धारित समय के अनुसार होती है और लोगों को पानी के लिए इंतजार करना पड़ता है।
सड़कों की हालत भी सवालों के घेरे में
पानी के साथ शहर की सड़कों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्मार्ट सिटी परियोजना में सड़कों और शहरी ढांचे को बेहतर बनाने पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन कई जगह सड़कें खराब हैं।
बारिश के दौरान सड़कों पर जलभराव, गड्ढे और टूट-फूट की समस्या सामने आती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अच्छी सड़कें शहर की बुनियादी जरूरत हैं। ऐसे में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि सड़कें खराब हैं तो परियोजना की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मोटा शुल्क, सुविधाएं अधूरी
नागरिकों का कहना है कि उनसे विभिन्न सेवाओं के लिए शुल्क वसूला जा रहा है। इसके बावजूद पानी, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। लोगों का सवाल है कि शुल्क और स्मार्ट सिटी परियोजना पर खर्च की गई राशि का लाभ आखिर उन्हें किस रूप में मिल रहा है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत खर्च किए गए 72 करोड़ रुपये का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी बताया जाए कि किन कार्यों पर कितना पैसा खर्च हुआ और उनसे नागरिकों को क्या लाभ मिला।
जवाबदेही तय करने की मांग
नागरिकों का कहना है कि स्मार्ट सिटी का मतलब केवल आधुनिक योजनाएं और बड़े प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि लोगों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं देना भी है। यदि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी पानी और सड़क जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, तो संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अब लोगों की नजर इस बात पर है कि प्रशासन इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेता है और स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत अधूरी सुविधाओं को कब तक पूरा किया जाता है। 72 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी यदि नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान हैं, तो यह परियोजना के क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।