एनईपी-2020: 55 जिलों में सिर्फ बोर्ड बदले, न प्रोफेसर मिले न लैब; उच्च शिक्षा के छात्र YouTube के भरोसे
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 को लागू करने का उद्देश्य देश की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, रोजगारपरक और कौशल आधारित बनाना है। लेकिन 55 जिलों में इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई संस्थानों में बदलाव के नाम पर केवल बोर्ड बदले गए, जबकि न तो पर्याप्त प्रोफेसरों की व्यवस्था हुई और न ही जरूरी प्रयोगशालाएं विकसित की गईं। ऐसे में विद्यार्थियों को पढ़ाई और प्रायोगिक ज्ञान के लिए YouTube जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का सहारा लेना पड़ रहा है।
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े इस मुद्दे ने नीति के जमीनी क्रियान्वयन, शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं पर चर्चा तेज कर दी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान, बहुविषयक शिक्षा और कौशल विकास के अवसर देने पर जोर दिया गया है। हालांकि, इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संस्थानों में पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता जरूरी है।
55 जिलों में बुनियादी सुविधाओं पर सवाल
एनईपी-2020 के तहत शिक्षा व्यवस्था में कई बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें पाठ्यक्रम को अधिक लचीला बनाना, विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों के अध्ययन का अवसर देना और रोजगार से जुड़े कौशल विकसित करना शामिल है।
लेकिन सामने आई जानकारी के अनुसार, 55 जिलों में शिक्षा संस्थानों की स्थिति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ जगहों पर प्रशासनिक या ढांचागत बदलाव तो किए गए, लेकिन शिक्षण व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी कदम पर्याप्त रूप से नहीं उठाए गए।
यदि संस्थानों में प्रोफेसरों के पद खाली रहते हैं और प्रयोगशालाओं की सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं, तो विद्यार्थियों को निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करने और विषयों को गहराई से समझने में कठिनाई हो सकती है।
प्रोफेसरों की कमी से पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका
किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की गुणवत्ता में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रोफेसर विद्यार्थियों को विषय की सैद्धांतिक जानकारी देने के साथ-साथ शोध, प्रोजेक्ट और व्यावहारिक अध्ययन में भी मार्गदर्शन करते हैं।
शिक्षकों की कमी होने पर कक्षाओं का नियमित संचालन, पाठ्यक्रम पूरा करना और विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसका असर परीक्षा की तैयारी और विद्यार्थियों की शैक्षणिक क्षमता पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में खाली पदों को भरना और विषयों के अनुसार योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करना महत्वपूर्ण है। इससे विद्यार्थियों को संस्थान में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और मार्गदर्शन मिल सकेगा।
लैब नहीं होने से प्रैक्टिकल ज्ञान पर असर
विज्ञान, तकनीकी और अन्य प्रयोग आधारित विषयों में प्रयोगशालाओं का विशेष महत्व होता है। विद्यार्थियों को केवल किताबों से जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें प्रयोग करके सीखने का अवसर भी मिलना चाहिए।
यदि कॉलेजों में जरूरी उपकरण, प्रयोगशालाएं और तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, तो विद्यार्थियों के व्यावहारिक ज्ञान पर असर पड़ सकता है। इससे उन्हें भविष्य में उच्च शिक्षा, शोध और रोजगार से जुड़े कार्यों में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
YouTube बना पढ़ाई का सहारा
शिक्षकों और प्रयोगशालाओं की कमी के बीच विद्यार्थी ऑनलाइन वीडियो और डिजिटल शैक्षणिक सामग्री की मदद ले रहे हैं। YouTube पर उपलब्ध लेक्चर से उन्हें कठिन विषय समझने, सवालों के हल देखने और परीक्षा की तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, ऑनलाइन सामग्री कक्षा में शिक्षक के मार्गदर्शन और प्रयोगशाला में मिलने वाले वास्तविक अनुभव का पूरी तरह विकल्प नहीं बन सकती। विद्यार्थियों को अपनी शंकाओं का समाधान करने और प्रैक्टिकल सीखने के लिए संस्थागत सहयोग भी जरूरी है।
एनईपी-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए केवल पाठ्यक्रम या प्रशासनिक बदलाव पर्याप्त नहीं हैं। इसके साथ शिक्षकों की नियुक्ति, प्रयोगशालाओं का विकास, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता और नियमित मूल्यांकन भी जरूरी है।
55 जिलों में प्रोफेसरों और लैब की कमी से संबंधित दावों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जिलेवार आंकड़ों, खाली पदों और उपलब्ध सुविधाओं का आधिकारिक आकलन जरूरी होगा। फिलहाल, यह मुद्दा शिक्षा नीति को कागजों से निकालकर कक्षाओं और प्रयोगशालाओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।