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MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 20 वर्षीय युवती को जैन दीक्षा लेने की इच्छा पर मिलेगी पुलिस सुरक्षा, बताया मौलिक और धार्मिक अधिकार

 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने जैन धर्म में दीक्षा लेने की इच्छा रखने वाली 20 वर्षीय युवती के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने युवती की इच्छा को उसके मौलिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ते हुए उसे पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने की स्वतंत्रता है। इसमें अपनी आस्था और धार्मिक मार्ग चुनने का अधिकार भी शामिल है।

युवती ने जताई थी जैन दीक्षा लेने की इच्छा

मामले में 20 वर्षीय युवती ने जैन परंपरा के अनुसार दीक्षा लेने की इच्छा जताई थी। इसके बाद सुरक्षा को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया।

याचिका में आशंका जताई गई थी कि दीक्षा लेने के उसके फैसले को लेकर विरोध हो सकता है। युवती ने अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक जीवन अपनाने के लिए सुरक्षा की मांग की थी।

कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता को माना अधिकार

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने और अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने की स्वतंत्रता देता है।

अदालत ने माना कि यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी धार्मिक परंपरा या आध्यात्मिक मार्ग को अपनाना चाहता है तो उसे केवल अपनी पसंद के कारण रोका नहीं जा सकता।

कोर्ट ने युवती की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे आवश्यक पुलिस सुरक्षा देने के निर्देश जारी किए।

बालिग व्यक्ति के फैसले में हस्तक्षेप नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति पर उसकी इच्छा के खिलाफ कोई निर्णय थोपा नहीं जा सकता।

अदालत ने कहा कि धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित अधिकार हैं।

जैन दीक्षा और परंपरा

जैन धर्म में दीक्षा को सांसारिक जीवन का त्याग कर आध्यात्मिक मार्ग अपनाने की प्रक्रिया माना जाता है। दीक्षा लेने वाला व्यक्ति संयम, तप और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए साधु या साध्वी जीवन की ओर बढ़ता है।

ऐसे मामलों में व्यक्ति की इच्छा, परिवार की सहमति और सामाजिक परिस्थितियां अक्सर चर्चा का विषय बनती रही हैं।

हाईकोर्ट के इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।